श्रीडूंगरगढ क्षेत्र के साहित्यकारों ने साहित्यकार मुंशी प्रेमचन्द की जयन्ती पर संगोष्ठी का आयोजन किया, पढ़े पूरी खबर

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समाचार-गढ़ 31 जुलाई 2020 श्रीडूंगरगढ। स्थानीय साहित्यिक संस्था राष्ट्र भाषा हिन्दी प्रचार समिति द्वारा संस्कृति भवन में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर विचार गोष्ठी में अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्याम महर्षि ने कहा कि प्रेमचंद का लेखन खेमों में बटे दासत्व भाव से ग्रसित लेखन युग में परिवर्तन की मशाल लेकर आम आदमी की पीड़ा को प्रकट करने के योद्धा के रूप में लड़ी गई लड़ाई का बिंब है। वरिष्ठ साहित्य कार सत्यदीप ने कहा कि साहित्य जब तक मन रंजन का साधन बना कर जनता को परोसा जाता रहेगा तब तक वह अपने अधिकारों के लिए सजग नहीं हो पायेगा, और शोषण को नियति या ईश्वर का प्रसाद मान अंगीकार करता चला जायेगा।चाहे सता किसी काल या किसी व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती हो।जन की पीड़ा की अभिव्यक्ति को व्यक्त करने को हर युग का अपना कबीर होता है, जो सच की आंख में अंगुली डालने वाला पक्ष सामने लाए।
वैसे शब्द साधना स्वयंमेव प्रगतिशील होती है। क्योंकि शब्द ही वह हथियार है जो सदा शोषण के खिलाफ जन चेतना का बिगुल निरंतर फूंकता है। पर जब शब्द साधना निरंतर स्तुति गान में शामिल हो, सता के इर्दगिर्द दरबारी गान करती है तो चेतना भोथरी हो जाती है। अपने युग के कबीर के रूप में प्रेमचंद का लेखन कभी पुराना नहीं होगा। बजरंग शर्मा ने उनकी कहानी बूढी काकी व ईदगाह का उदाहरण देते हुए बताया कि सामाजिक धरातल का आत्मविश्लेषण को जी कर लिखा जाना ही सच्चा लेखन होता है। प्रेमचंद की प्रत्येक रचना हृदय को छूकर रख देती है। गोष्ठी में भंवर भोजक, रामचंद्र राठी, विजय महर्षि, व ओम प्रकाश प्रजापति ने भी अपने विचार रखे।

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