कमलादेवी बाफना का चोवियार संथारा सम्पन्न, जैन धर्म में सबसे पुरानी प्रथा मानी जाती है संथारा प्रथा

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समाचारगढ़ (अशोक पारीक) श्रीडूंगरगढ़ । जैन धर्म में सबसे पुरानी प्रथा मानी जाती है संथारा प्रथा संलेखना। जैन समाज में इस तरह से देह त्यागने को बहुत पवित्र कार्य माना जाता है। इसमें जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी मृत्यु निकट है तो वह खुद को एक कमरे में बंद कर खाना.पीना त्याग देता है। जैन शास्त्रों में इस तरह की मृत्यु को समाधिमरण, पंडितमरण अथवा संथारा भी कहा जाता है। इसी परंपरा को निभाते हुए श्रीडूंगरगढ के श्रीमती कमलादेवी बाफना ने 65 दिनों के संलेखना के साथ समाधिमरण का वरण किया। 27 फरवरी से प्रारंभ अपनी 12 दिनों की तपस्या के तुरंत बाद ही आचार्य श्री महाश्रमण जी की आज्ञा से श्रीडूंगरगढ सेवा केंद्र व्यवस्थापिका साध्वी श्री कनकरेखा और सहवर्तिनी साध्वियों और परिजनों की उपस्थिति में तिविहार संथारे का प्रत्याख्यान सहर्ष स्वीकार किया और 12 मई को चैविहार संथारे का प्रत्याख्यान करके पानी भी पीना छोड़ दिया।

जैन परम्परा के अनुसार श्रीमती कमलादेवी बाफना ने समाधिमरण का वरण किया।
श्राविका श्रीमती कमला देवी बाफना की देह पंचतत्व में विलीन। पुत्र राजकुमार बाफना ने दी अग्नि।

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