समाचार गढ़ 6 नवंबर 2026।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस ने अपनी वीटो ताकत का इस्तेमाल कर अमेरिका के एक अहम प्रस्ताव को रोक दिया। मामला उत्तरी अफ्रीका के पश्चिमी सहारा क्षेत्र में तैनात संयुक्त राष्ट्र के शांति मिशन MINURSO से जुड़ा है। अमेरिका इस मिशन का कार्यकाल बढ़ाने के साथ उसकी भूमिका में बदलाव करना चाहता था, लेकिन रूस ने प्रस्ताव के खिलाफ वीटो कर दिया। इसके बाद रूस का अपना वैकल्पिक प्रस्ताव भी पास नहीं हो सका। दोनों प्रस्तावों के विफल होने से करीब 35 साल से चल रहे MINURSO मिशन का कार्यकाल 31 अक्टूबर 2026 को समाप्त हो गया।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की ताकत और वैश्विक राजनीति में अमेरिका-रूस के मतभेदों को सामने ला दिया है। सवाल यह भी है कि आखिर पश्चिमी सहारा को लेकर ऐसा क्या विवाद है, जिस पर दुनिया की बड़ी शक्तियां आमने-सामने आ गई हैं?
रूस के एक वोट ने कैसे रोक दिया अमेरिका का प्रस्ताव?
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य देश होते हैं। इनमें अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस पांच स्थायी सदस्य हैं। इन देशों के पास वीटो का विशेष अधिकार है।
सामान्य तौर पर किसी प्रस्ताव को पास होने के लिए कम से कम 9 सदस्यों का समर्थन जरूरी होता है। लेकिन किसी महत्वपूर्ण प्रस्ताव पर पांच स्थायी सदस्यों में से कोई एक भी विरोध में वोट कर दे, तो वह प्रस्ताव रुक जाता है। यानी 14 देश समर्थन में हों और एक स्थायी सदस्य वीटो कर दे, तब भी प्रस्ताव पास नहीं हो सकता।
पश्चिमी सहारा के मामले में भी यही हुआ। अमेरिका के प्रस्ताव को 11 देशों का समर्थन मिला, लेकिन रूस ने वीटो लगा दिया। इस तरह बहुमत का समर्थन होने के बावजूद प्रस्ताव मंजूर नहीं हो सका।
अमेरिका का प्रस्ताव किस बारे में था?
इस विवाद को समझने के लिए पश्चिमी सहारा का इतिहास जानना जरूरी है। यह उत्तरी अफ्रीका का एक क्षेत्र है, जिस पर मोरक्को अपना अधिकार जताता है। दूसरी ओर, पोलिसारियो फ्रंट यहां के लोगों के लिए एक स्वतंत्र देश बनाने की मांग करता है। उसे पड़ोसी देश अल्जीरिया का समर्थन हासिल है।
1975 में स्पेन के इस क्षेत्र से हटने के बाद मोरक्को ने इसके बड़े हिस्से पर नियंत्रण कर लिया। इसके बाद मोरक्को और पोलिसारियो फ्रंट के बीच संघर्ष शुरू हुआ। 1991 में युद्धविराम के बाद संयुक्त राष्ट्र ने MINURSO मिशन की स्थापना की।
इस मिशन का मुख्य उद्देश्य युद्धविराम पर नजर रखना और ऐसा जनमत संग्रह कराने में मदद करना था, जिसमें पश्चिमी सहारा के लोग तय कर सकें कि उन्हें स्वतंत्र देश बनना है या मोरक्को के साथ रहना है। हालांकि, मतदाता कौन होंगे, इस मुद्दे पर सहमति नहीं बन पाई और जनमत संग्रह कभी नहीं हो सका।
मोरक्को की स्वायत्तता योजना पर क्यों था विवाद?
मोरक्को ने 2007 में पश्चिमी सहारा के लिए स्वायत्तता योजना पेश की थी। इसके तहत क्षेत्र को मोरक्को की संप्रभुता के भीतर रहते हुए स्थानीय मामलों में शासन चलाने का अधिकार देने की बात कही गई थी।
अमेरिका के नए प्रस्ताव में इसी योजना को विवाद के समाधान का सबसे व्यावहारिक आधार बताया गया था। साथ ही MINURSO के नाम और कामकाज में बदलाव की बात भी शामिल थी। यानी मिशन का पुराना जनमत संग्रह वाला उद्देश्य पीछे छूटता और उसकी भूमिका मोरक्को की योजना के आधार पर होने वाली राजनीतिक बातचीत से जुड़ जाती।
रूस ने इसी बात पर आपत्ति जताई। उसका कहना था कि प्रस्ताव पहले से ही मोरक्को की योजना को समाधान का आधार मान रहा है। इससे पश्चिमी सहारा के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार पर असर पड़ सकता है। रूस के मुताबिक, किसी एक पक्ष की शर्तों के आधार पर विवाद का समाधान तय करना उचित नहीं है।
फ्रांस और ब्रिटेन अमेरिका के साथ क्यों खड़े थे?
अमेरिकी प्रस्ताव के समर्थन में फ्रांस और ब्रिटेन ने भी वोट दिया था। फ्रांस ने पश्चिमी सहारा पर मोरक्को की संप्रभुता का समर्थन किया और उसकी स्वायत्तता योजना को समाधान का आधार माना।
ब्रिटेन ने भी 2007 की योजना को विवाद के स्थायी समाधान का व्यावहारिक रास्ता बताया। रूस के वीटो के बाद दोनों देशों ने नाराजगी जताई। ब्रिटेन का कहना था कि इस फैसले से सुरक्षा परिषद की कोशिशों को झटका लगा है और संयुक्त राष्ट्र मिशन की मौजूदगी भी खतरे में पड़ सकती है।
रूस का अपना प्रस्ताव भी नहीं हो सका पास
रूस ने अमेरिकी प्रस्ताव को रोकने के बाद अपना अलग प्रस्ताव पेश किया था। इसमें MINURSO मिशन का कार्यकाल बिना बड़े बदलाव के एक साल और बढ़ाने की बात कही गई थी। रूस चाहता था कि संयुक्त राष्ट्र की पुरानी व्यवस्था जारी रहे और विवाद का समाधान बातचीत के जरिए निकाला जाए।
लेकिन अमेरिका ने रूसी प्रस्ताव का विरोध किया। इस प्रस्ताव को केवल तीन देशों का समर्थन मिला, जबकि 11 देश मतदान से दूर रहे। जरूरी नौ वोट नहीं मिलने के कारण यह प्रस्ताव भी पास नहीं हो सका।
इस तरह अमेरिका और रूस, दोनों के प्रस्ताव विफल हो गए। नतीजतन, 31 अक्टूबर 2026 को MINURSO का कार्यकाल समाप्त हो गया। 1 नवंबर से मिशन के पास अपना काम जारी रखने का नया आदेश नहीं रहा।
मोरक्को के राजा ने आगे के लिए क्या तैयारी की?
मिशन का कार्यकाल समाप्त होने के बाद मोरक्को के राजा मोहम्मद VI ने अधिकारियों को नई स्थिति के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया। 4 नवंबर को रबात के शाही महल में हुई बैठक में उन्होंने तीन प्राथमिकताएं तय कीं- मोरक्को की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और पश्चिमी सहारा में रहने वाले लोगों की सुरक्षा।
राजा ने गृह मंत्रालय को संयुक्त राष्ट्र के साथ समन्वय कर MINURSO की वापसी और उसके संसाधनों को हटाने की प्रक्रिया संभालने को कहा। इसमें मिशन के कर्मचारियों, वाहनों और अन्य सुविधाओं की वापसी शामिल है।
मोरक्को ने यह भी कहा है कि वह युद्धविराम का पालन जारी रखेगा और क्षेत्र में चल रही विकास परियोजनाओं को नहीं रोकेगा।
आगे क्या होगा? क्या फिर बढ़ सकता है तनाव?
करीब 35 साल तक MINURSO की मौजूदगी ने पश्चिमी सहारा में युद्धविराम पर नजर रखने में अहम भूमिका निभाई। अब इसके कार्यकाल की समाप्ति से क्षेत्र में सुरक्षा और युद्धविराम की निगरानी को लेकर चिंता बढ़ गई है।
संयुक्त राष्ट्र ने सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। साथ ही स्पष्ट किया है कि मिशन का कार्यकाल समाप्त होने से पश्चिमी सहारा के लोगों का आत्मनिर्णय का अधिकार खत्म नहीं होता। संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत के जरिए राजनीतिक समाधान की कोशिश जारी रखने की बात भी कही गई है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल मोरक्को और पोलिसारियो फ्रंट तक सीमित नहीं है। अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों के बीच कूटनीतिक मतभेद भी सामने आए हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संयुक्त राष्ट्र मिशन के बिना पश्चिमी सहारा में शांति और राजनीतिक समाधान की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ेगी।








