विशेष संसद सत्र की चर्चा तेज, परिसीमन के साथ महिला आरक्षण लागू करने पर हो सकती है बड़ी पहल; जानिए आम जनता और राज्यों पर इसका क्या होगा असर।
समाचार-गढ़ 5 अगस्त, 2026।
नई दिल्ली: देश की राजनीति में एक बार फिर परिसीमन (Delimitation) और महिला आरक्षण चर्चा के केंद्र में हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार मानसून सत्र के बाद विशेष संसद सत्र बुलाने पर विचार कर रही है। इसमें परिसीमन, महिला आरक्षण को लागू करने और उससे जुड़े संवैधानिक संशोधनों पर चर्चा हो सकती है। हालांकि, इस पर अंतिम फैसला संसद की प्रक्रिया के बाद ही होगा।
क्या होता है परिसीमन और इसकी जरूरत क्यों पड़ती है?
परिसीमन का मतलब लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का दोबारा निर्धारण करना होता है। इसका उद्देश्य बढ़ती जनसंख्या के अनुसार सांसदों और विधायकों के प्रतिनिधित्व में संतुलन बनाए रखना है।
- संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 में परिसीमन का प्रावधान है।
- यह प्रक्रिया परिसीमन आयोग द्वारा कराई जाती है, जो एक स्वतंत्र निकाय है।
- वर्तमान में लोकसभा में 543 निर्वाचित सीटें हैं, जबकि देश की आबादी कई गुना बढ़ चुकी है। इसी कारण लंबे समय से नए परिसीमन की मांग उठती रही है।
- प्रत्येक जनगणना के बाद संसद, सीटों के आवंटन और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन का निर्णय कर सकती है।
महिला आरक्षण से क्या है इसका संबंध?
महिला आरक्षण कानून के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी हैं। लेकिन इसे लागू करने से पहले यह तय करना होगा कि कौन-सी सीटें आरक्षित होंगी। यही वजह है कि परिसीमन को महिला आरक्षण लागू करने की अहम शर्त माना जा रहा है।
प्रस्तावित व्यवस्था के तहत नई निर्वाचन सीमाओं के आधार पर महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण किया जाएगा। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) की महिलाओं के लिए भी अलग आरक्षण का प्रावधान रहेगा।
लोकसभा सीटें बढ़ीं तो किस पर पड़ेगा सबसे ज्यादा असर?
अगर भविष्य में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो इसका सबसे बड़ा असर राज्यों के प्रतिनिधित्व पर पड़ सकता है।
- अधिक आबादी वाले राज्यों में सीटों की संख्या बढ़ने की संभावना है।
- वहीं, दक्षिण भारत के कई राज्यों ने पहले भी चिंता जताई है कि जनसंख्या नियंत्रण के बावजूद उनका सापेक्ष प्रतिनिधित्व घट सकता है।
- केंद्र सरकार का कहना है कि किसी भी बदलाव में सभी राज्यों के हितों और संवैधानिक संतुलन का ध्यान रखा जाएगा।
यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो यह भारत की चुनावी व्यवस्था और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा बदलाव साबित हो सकता है।










