समाचार-गढ़ 9 अगस्त, 2026।
अगले साल उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और गोवा में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों में 18 से 29 साल के Gen-Z मतदाता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। इन सात राज्यों में करीब 22% वोटर इसी आयु वर्ग के हैं।
दिल्ली में हुए Gen-Z आंदोलन और हाल के कुछ उपचुनावों के नतीजों के बाद युवाओं के राजनीतिक रुझान को लेकर चर्चा तेज हुई है। अब राजनीतिक दल भी रोजगार, शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट और डिजिटल अवसरों जैसे मुद्दों पर युवाओं को साधने की रणनीति बना रहे हैं।
5% वोट बदला तो कई सीटों पर असर
पिछले विधानसभा चुनावों के आंकड़ों के मुताबिक इन सात राज्यों की कुल 940 सीटों में 257 सीटों यानी करीब 27% सीटों पर जीत का अंतर 5% या उससे कम रहा था।
उत्तर प्रदेश में ऐसी 131 सीटें थीं, जबकि गुजरात में 27, पंजाब में 24, उत्तराखंड में 15 और हिमाचल प्रदेश में 14 सीटों पर मुकाबला 5% से कम अंतर से तय हुआ।
ऐसे में यदि Gen-Z वोटर्स का केवल एक छोटा हिस्सा भी एकजुट होकर किसी पार्टी के पक्ष में जाता है, तो कई सीटों पर चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।
पार्टियां युवाओं पर क्यों बढ़ा रहीं फोकस?
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक युवा वोटर अब केवल जाति और धर्म के आधार पर मतदान करने वाला वर्ग नहीं रह गया है। रोजगार, शिक्षा, करियर, महंगाई और भविष्य के अवसर जैसे मुद्दे उसके फैसले को प्रभावित कर सकते हैं।
इसी वजह से पार्टियां अपनी रणनीति में बदलाव कर रही हैं। भाजपा ने रोजगार और युवा संवाद पर जोर बढ़ाया है। कांग्रेस आंदोलनकारी युवाओं के संपर्क और डिजिटल कैंपेन पर काम कर रही है, जबकि सपा ने युवाओं और कैंपस तक पहुंच बढ़ाने की जिम्मेदारी डिंपल यादव को दी है। वहीं ABVP भी कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों के जरिए अपना विस्तार बढ़ा रही है।
मुफ्त योजनाओं से ज्यादा समाधान की मांग?
Gen-Z के बीच केवल मुफ्त योजनाओं के बजाय रोजगार, स्किल डेवलपमेंट, बेहतर शिक्षा और वास्तविक अवसर जैसे मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अगर यह ट्रेंड चुनाव तक कायम रहता है, तो राजनीतिक दलों को सिर्फ घोषणाओं के बजाय व्यावहारिक और लागू किए जा सकने वाले वादों पर जोर देना पड़ सकता है।
चुनाव से पहले परिसीमन भी बड़ा मुद्दा
2027 के चुनावों से पहले परिसीमन और महिला आरक्षण भी राजनीतिक बहस का अहम विषय बने हुए हैं। प्रस्तावित व्यवस्था में लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने से जुड़े बदलावों पर चर्चा हो रही है।
दक्षिणी राज्यों को आशंका है कि आबादी के आधार पर परिसीमन होने पर जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है। इसलिए परिसीमन का मुद्दा भी आने वाले चुनावों में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।









