समाचार-गढ़ 28 सितंबर, 2026।
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते संपर्क के बीच G2 यानी अमेरिका-चीन के संभावित द्विपक्षीय ढांचे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ ब्रह्मा चेलानी ने इस अवधारणा को लेकर एशिया के कई देशों की चिंताओं का जिक्र किया है। उन्होंने खास तौर पर ताइवान, जापान और भारत से जुड़े संभावित रणनीतिक प्रभावों पर बात की है।
हालांकि, अभी कोई औपचारिक अमेरिका-चीन G2 व्यवस्था अस्तित्व में नहीं है। G2 फिलहाल दोनों बड़ी शक्तियों के बीच संभावित व्यापक समन्वय या समझ की एक रणनीतिक अवधारणा है। 2026 में अमेरिका-चीन संबंधों में उच्चस्तरीय संपर्क बढ़ने के साथ इस विचार पर चर्चा फिर तेज हुई है।
ताइवान को लेकर क्यों बढ़ सकती है चिंता?
चेलानी के विश्लेषण के मुताबिक, अमेरिका और चीन के बीच अगर किसी तरह का बड़ा रणनीतिक समझौता होता है तो ताइवान का मुद्दा भी चर्चा के केंद्र में आ सकता है। ऐसी स्थिति में ताइवान को आशंका हो सकती है कि उसकी सुरक्षा और भविष्य से जुड़े सवाल बड़ी शक्तियों के बीच बातचीत का हिस्सा बन सकते हैं।
ब्रुकिंग्स के एक विस्तृत विश्लेषण में भी अमेरिका-चीन G2 की संभावनाओं को लेकर ताइवान की चिंताओं पर चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच संबंधों में किसी बदलाव की दिशा और उसकी सीमा को लेकर अभी अनिश्चितता बनी हुई है।
हालांकि, अमेरिका ने हाल में जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान के प्रति अपनी सुरक्षा प्रतिबद्धताओं को दोहराया है। इससे यह संकेत मिलता है कि G2 की चर्चा को मौजूदा अमेरिकी गठबंधन व्यवस्था में तत्काल बदलाव के बराबर नहीं माना जा सकता।
जापान के लिए क्या बदल सकता है?
चेलानी ने जापान की चिंता का भी जिक्र किया है। उनके मुताबिक, अगर अमेरिका और चीन के बीच रिश्तों में बड़ा रणनीतिक बदलाव आता है तो इसका असर अमेरिका-जापान सुरक्षा गठबंधन पर पड़ सकता है।
ब्रुकिंग्स के विश्लेषण में भी कहा गया है कि अमेरिका-चीन के बीच किसी संभावित समझ या समायोजन का जापान की रणनीतिक गणना पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से टोक्यो अमेरिका के साथ अपने गठबंधन के साथ-साथ दूसरे क्षेत्रीय साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाने पर भी जोर दे रहा है।
भारत के लिए G2 क्यों अहम है?
भारत के संदर्भ में चेलानी का तर्क है कि अमेरिका और चीन के बीच किसी द्विपक्षीय शक्ति-संतुलन का मजबूत होना एशिया की बहुध्रुवीय व्यवस्था पर असर डाल सकता है। भारत इंडो-पैसिफिक में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ सहयोग करता है और क्षेत्रीय संतुलन में अपनी भूमिका बनाए रखने पर जोर देता है।
अगर अमेरिका और चीन दुनिया के बड़े रणनीतिक मुद्दों पर सीधे समझौते करने की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो भारत समेत अन्य क्षेत्रीय शक्तियों को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं और साझेदारियों का नए सिरे से आकलन करना पड़ सकता है। ब्रुकिंग्स के विश्लेषण में भी कहा गया है कि अमेरिका-चीन संबंधों में किसी बड़े बदलाव की स्थिति में इंडो-पैसिफिक के दूसरे देशों की रणनीतिक गणना प्रभावित हो सकती है।
क्या वास्तव में बनेगा अमेरिका-चीन G2?
फिलहाल इसका कोई औपचारिक ढांचा नहीं है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, सुरक्षा, ताइवान और इंडो-पैसिफिक में प्रभाव जैसे मुद्दों पर मतभेद बने हुए हैं।
G2 की अवधारणा नई नहीं है। इसे पहले भी अमेरिका और चीन के बीच वैश्विक मुद्दों पर संयुक्त नेतृत्व की संभावित व्यवस्था के तौर पर चर्चा में लाया गया था। लेकिन उस समय भी सवाल उठा था कि क्या दुनिया के बड़े फैसलों में केवल दो शक्तियों की भूमिका पर्याप्त होगी और क्या बाकी प्रमुख देशों को इससे बाहर रखा जा सकता है।
ऐसे में फिलहाल G2 को किसी बने-बनाए गठबंधन की बजाय अमेरिका-चीन संबंधों की संभावित दिशा को समझने वाली रणनीतिक अवधारणा के रूप में देखा जा रहा है। अगर दोनों देशों के बीच उच्चस्तरीय संपर्क आगे भी बढ़ता है, तो इसका असर ताइवान, जापान और भारत जैसे देशों की रणनीतिक गणना पर कितना पड़ता है, यह आने वाले समय में महत्वपूर्ण सवाल रहेगा।








