Nature Nature

Piyush Goyal on Europe: “ये समस्या आपने पैदा की!” जलवायु पर यूरोप को सुनाई खरी-खरी, CBAM और स्टील शुल्क पर भी घेरा

Nature

समाचार गढ़ 23 अक्टूबर 2026।

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जलवायु परिवर्तन और व्यापारिक प्रतिबंधों को लेकर यूरोप के दोहरे रवैये पर सवाल उठाए हैं। जर्मनी की राजधानी बर्लिन में आयोजित Berlin Global Dialogue 2026 में उन्होंने विकसित देशों को उनके ऐतिहासिक कार्बन उत्सर्जन की याद दिलाते हुए कहा कि जलवायु संकट पैदा करने में उनकी बड़ी भूमिका रही है, लेकिन अब विकासशील देशों पर अतिरिक्त लागत और नियमों का बोझ डाला जा रहा है।

गोयल ने सवाल किया, “इस समस्या के लिए सबसे पहले जिम्मेदार कौन है? वातावरण में इतना कार्बन किसने छोड़ा? यह समस्या आपने पैदा की है।” उन्होंने यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था (CBAM) और स्टील आयात पर शुल्क को लेकर भी चेतावनी दी कि ऐसी नीतियां यूरोप की अपनी अर्थव्यवस्था और उद्योगों के लिए महंगी साबित हो सकती हैं।

विकसित देशों को उनकी जिम्मेदारी क्यों याद दिलाई?

बर्लिन में चर्चा के दौरान पीयूष गोयल ने कहा कि औद्योगिक विकास के लंबे दौर में विकसित देशों ने बड़े पैमाने पर जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल किया और इससे वैश्विक कार्बन उत्सर्जन बढ़ा। अब जब दुनिया जलवायु परिवर्तन से निपटने की कोशिश कर रही है, तो विकासशील देशों की परिस्थितियों और जरूरतों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।

गोयल ने भारत की आबादी और आर्थिक जरूरतों का जिक्र करते हुए कहा कि देश को करीब 140 करोड़ लोगों की ऊर्जा, भोजन और सुरक्षा संबंधी आवश्यकताएं पूरी करनी हैं। इसके बावजूद भारत स्वच्छ ऊर्जा के विस्तार पर काम कर रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि जलवायु परिवर्तन की जिम्मेदारी तय करते समय देशों के ऐतिहासिक उत्सर्जन, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन और आर्थिक क्षमता को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, विकासशील देशों से उत्सर्जन घटाने की अपेक्षा करने के साथ उन्हें जरूरी वित्तीय और तकनीकी सहायता भी मिलनी चाहिए।

100 अरब डॉलर की मदद पर क्या बोले गोयल?

पीयूष गोयल ने विकसित देशों की ओर से विकासशील देशों को हर साल 100 अरब डॉलर का जलवायु वित्त उपलब्ध कराने की प्रतिबद्धता का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि गरीब और विकासशील देशों को स्वच्छ तकनीक अपनाने, उत्सर्जन कम करने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए पर्याप्त सहायता नहीं मिल रही है।

उन्होंने इस प्रतिबद्धता पर असंतोष जताते हुए कहा कि 11 साल बाद भी उन्हें इस वादे के अनुरूप सहायता नहीं मिली और यह सब केवल वादे बनकर रह गया है। यह गोयल की ओर से जताई गई आलोचना थी; इसे इस बात का स्वतंत्र प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए कि विकासशील देशों को जलवायु वित्त के रूप में कोई रकम मिली ही नहीं।

गौरतलब है कि विकसित देशों ने 2009 में विकासशील देशों के लिए 2020 तक सालाना 100 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य तय किया था। बाद में इस लक्ष्य को 2025 तक बढ़ाया गया। इस वित्त का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से निपटने और कम उत्सर्जन वाली अर्थव्यवस्थाओं की ओर बढ़ने में विकासशील देशों की मदद करना था।

CBAM और 50% स्टील शुल्क पर यूरोप को क्यों घेरा?

पीयूष गोयल ने यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन व्यवस्था यानी CBAM की आलोचना करते हुए कहा कि जलवायु के नाम पर लगाए जा रहे अतिरिक्त खर्च यूरोपीय उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को भी कमजोर कर सकते हैं।

CBAM के तहत यूरोपीय संघ में आने वाले कुछ उत्पादों के निर्माण के दौरान हुए कार्बन उत्सर्जन के आधार पर लागत निर्धारित की जाती है। इसके दायरे में लोहा और स्टील, एल्युमीनियम, सीमेंट, उर्वरक, बिजली और हाइड्रोजन जैसे क्षेत्र शामिल हैं। इस व्यवस्था का निर्णायक चरण 1 जनवरी 2026 से लागू हुआ।

गोयल ने स्टील आयात पर 50 प्रतिशत शुल्क का भी उल्लेख करते हुए कहा कि यूरोप खुद पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डाल रहा है। हालांकि, यहां दोनों व्यवस्थाओं के बीच अंतर समझना जरूरी है। CBAM और स्टील पर 50 प्रतिशत आयात शुल्क अलग-अलग उपाय हैं। CBAM कार्बन उत्सर्जन से जुड़ी लागत निर्धारित करता है, जबकि स्टील पर 50 प्रतिशत शुल्क लागू कोटा से अधिक आयात पर लगने वाला अलग व्यापारिक उपाय है।

महंगा स्टील और सीमेंट बढ़ा सकते हैं आम लोगों की मुश्किलें

गोयल ने चेतावनी दी कि स्टील, एल्युमीनियम और सीमेंट जैसी जरूरी निर्माण सामग्री की लागत बढ़ने से यूरोप में बुनियादी ढांचा परियोजनाएं महंगी हो सकती हैं। बंदरगाहों, हवाई अड्डों, राजमार्गों, बिजली-पानी की सुविधाओं और पाइपलाइन के निर्माण में इन सामग्रियों की अहम भूमिका होती है।

अगर इनकी लागत बढ़ती है, तो इसका असर कंपनियों के खर्च और निर्माण परियोजनाओं के बजट पर पड़ सकता है। आगे चलकर इसका कुछ बोझ उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकता है। हालांकि, वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि कंपनियां अतिरिक्त लागत को किस हद तक खुद वहन करती हैं और कितना हिस्सा ग्राहकों पर डालती हैं।

गोयल ने यह भी कहा कि व्यापारिक साझेदारों पर एकतरफा प्रतिबंध लगाने से जवाबी कदमों का रास्ता खुल सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय कारोबार और कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता प्रभावित होने का जोखिम रहता है।

भारत ने जलवायु और विकास के बीच संतुलन पर दिया जोर

पीयूष गोयल ने कहा कि भारत की जिम्मेदारी केवल उत्सर्जन घटाने तक सीमित नहीं है। उसे बड़ी आबादी की ऊर्जा और भोजन की जरूरतें पूरी करने के साथ आर्थिक विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी ध्यान रखना है।

उन्होंने भारत के स्वच्छ ऊर्जा कार्यक्रम का जिक्र करते हुए कहा कि देश इन जरूरतों के बावजूद स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। भारत का पक्ष यह है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी देशों को योगदान देना चाहिए, लेकिन उनकी जिम्मेदारियां और क्षमताएं समान नहीं हैं।

यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में प्रचलित “साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारियों” के सिद्धांत से जुड़ा है। इसके तहत सभी देशों की जलवायु संरक्षण में भूमिका मानी जाती है, लेकिन ऐतिहासिक उत्सर्जन और आर्थिक क्षमताओं के अंतर को भी महत्व दिया जाता है।

व्यापार समझौतों में निष्पक्षता की मांग

गोयल ने कहा कि भारत अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ निष्पक्ष, समान और संतुलित समझौतों का समर्थन करता है। उनके मुताबिक, जलवायु संरक्षण के प्रयास ऐसे होने चाहिए, जिनसे विकासशील देशों के लिए आर्थिक प्रगति और स्वच्छ तकनीक अपनाने के अवसर सीमित न हों।

बर्लिन में दिए गए उनके बयान ने एक बार फिर जलवायु नीति और वैश्विक व्यापार के बीच बढ़ते तनाव को सामने रखा है। एक तरफ यूरोपीय संघ अपनी जलवायु नीति के तहत आयातित वस्तुओं के कार्बन उत्सर्जन की लागत तय कर रहा है, तो दूसरी तरफ भारत जैसे विकासशील देश इन नियमों के संभावित आर्थिक प्रभावों और निष्पक्षता पर सवाल उठा रहे हैं।

अब चुनौती यह है कि जलवायु संरक्षण, विकासशील देशों की जरूरतों और वैश्विक व्यापार के बीच ऐसा संतुलन कैसे बनाया जाए, जिससे पर्यावरणीय लक्ष्य भी पूरे हों और कारोबार पर अनावश्यक बोझ भी न पड़े।

  • Related Posts

    बैंक खाते में AI की घुसपैठ! अमेरिका के बड़े बैंकों ने क्यों कसे शिकंजे?

    समाचार गढ़ 23 अक्टूबर 2026। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) अब सिर्फ सवालों के जवाब देने या जानकारी जुटाने तक सीमित नहीं है। नए AI एजेंट यूजर की ओर से कई डिजिटल…

    India-China Border Tension: अरुणाचल में चीन से टकराव जारी! 3 साल में हर चौकी पर बनेंगे अंडरग्राउंड बंकर, ड्रोन से होगी निगरानी

    समाचार गढ़ 23 अक्टूबर 2026। भारत और चीन के बीच अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर तनाव कम होने के संकेत नहीं मिल रहे हैं। भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक…

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    Piyush Goyal on Europe: “ये समस्या आपने पैदा की!” जलवायु पर यूरोप को सुनाई खरी-खरी, CBAM और स्टील शुल्क पर भी घेरा

    Piyush Goyal on Europe: “ये समस्या आपने पैदा की!” जलवायु पर यूरोप को सुनाई खरी-खरी, CBAM और स्टील शुल्क पर भी घेरा

    बैंक खाते में AI की घुसपैठ! अमेरिका के बड़े बैंकों ने क्यों कसे शिकंजे?

    बैंक खाते में AI की घुसपैठ! अमेरिका के बड़े बैंकों ने क्यों कसे शिकंजे?

    India-China Border Tension: अरुणाचल में चीन से टकराव जारी! 3 साल में हर चौकी पर बनेंगे अंडरग्राउंड बंकर, ड्रोन से होगी निगरानी

    India-China Border Tension: अरुणाचल में चीन से टकराव जारी! 3 साल में हर चौकी पर बनेंगे अंडरग्राउंड बंकर, ड्रोन से होगी निगरानी

    असीम मुनीर की यात्रा के बाद भी नहीं सुलझा विवाद! ट्रकों में आगजनी की खबर, ईरान ने दी सीमा बंद करने की चेतावनी

    असीम मुनीर की यात्रा के बाद भी नहीं सुलझा विवाद! ट्रकों में आगजनी की खबर, ईरान ने दी सीमा बंद करने की चेतावनी

    INS विक्रांत पर गरजेगा राफेल-M! गोवा में फाइनल ट्रायल से बढ़ेगी नौसेना की ताकत

    INS विक्रांत पर गरजेगा राफेल-M! गोवा में फाइनल ट्रायल से बढ़ेगी नौसेना की ताकत

    Russia-US Deal: प्रतिबंधों के बीच अमेरिका पहुंचेगा रूसी डीजल! ट्रंप-पुतिन की डील से यूक्रेन क्यों नाराज?

    Russia-US Deal: प्रतिबंधों के बीच अमेरिका पहुंचेगा रूसी डीजल! ट्रंप-पुतिन की डील से यूक्रेन क्यों नाराज?
    Social Media Buttons
    error: Content is protected !!
    Verified by MonsterInsights