समाचार गढ़ 27 अक्टूबर 2026।
बलूचिस्तान की आजादी की मांग को लेकर जारी संघर्ष के बीच ‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ ने 13 नवंबर को हर साल दुनिया भर में बलूच राष्ट्रीय शहीद दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया है। संगठन के मुताबिक, यह दिन उन लोगों को समर्पित होगा, जिन्होंने बलूचिस्तान की आजादी और संप्रभुता के लिए अपनी जान गंवाई। इस तारीख का ऐतिहासिक संबंध 13 नवंबर 1839 को कलात पर ब्रिटिश सेना के हमले और वहां के शासक मीर मेहराब खान की मौत से जोड़ा जाता है।
1839 की उस लड़ाई से जुड़ा है 13 नवंबर का इतिहास
‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के अनुसार, 13 नवंबर 1839 को ब्रिटिश औपनिवेशिक सेना ने कलात के महल पर हमला किया था। उस समय कलात के शासक मीर मेहराब खान ने आत्मसमर्पण करने के बजाय अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी। इस संघर्ष में उनकी मौत हो गई। बलूच राष्ट्रवादी उन्हें ‘लाल शहीद’ के नाम से याद करते हैं।
संगठन ने अपने बयान में कहा कि इस लड़ाई में बलूचिस्तान के अलग-अलग समुदायों के लोगों ने भी जान गंवाई थी। इनमें दीवान बचू मल का नाम भी शामिल है, जिन्हें बलूच राज्य की हिंदू प्रजा का सदस्य बताया जाता है। संगठन के मुताबिक, उनका बलिदान इस बात का प्रतीक है कि उस दौर में क्षेत्र की रक्षा में विभिन्न समुदायों के लोगों ने हिस्सा लिया था।
हर साल शहीदों को दी जाएगी श्रद्धांजलि
संगठन ने कहा है कि 13 नवंबर को बलूच राष्ट्रीय शहीद दिवस के रूप में वैश्विक स्तर पर मनाया जाएगा। इस मौके पर बलूचिस्तान और दुनिया के अन्य हिस्सों में रहने वाले बलूच लोगों के एकत्र होने, मोमबत्तियां जलाने और शहीदों को श्रद्धांजलि देने की परंपरा का भी जिक्र किया गया है।
‘रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान’ के मुताबिक, इस आयोजन का उद्देश्य अलग-अलग देशों में रहने वाले बलूच लोगों को अपनी ऐतिहासिक पहचान और साझा स्मृतियों से जोड़ना है। संगठन ने इस दिवस के प्रचार के लिए #13NovBalochMartyrsDay हैशटैग भी जारी किया है।
कौन थे मीर मेहराब खान?
मीर मेहराब खान द्वितीय 19वीं सदी में कलात के शासक थे। उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने लगभग 1817 में शासन संभाला था और 13 नवंबर 1839 को ब्रिटिश सेना के हमले के दौरान उनकी मौत हो गई थी।
बलूच राष्ट्रवादी इतिहास में उन्हें ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के खिलाफ प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। 13 नवंबर को शहीद दिवस के तौर पर मनाने की परंपरा भी इसी ऐतिहासिक घटना से जुड़ी बताई जाती है।
बलूचिस्तान में लंबे समय से जारी है संघर्ष
पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत लंबे समय से राजनीतिक असंतोष और अलगाववादी संघर्ष का सामना कर रहा है। बलूच राष्ट्रवादी संगठन राजनीतिक अधिकारों, प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी और आत्मनिर्णय की मांग उठाते रहे हैं।
वहीं, इस क्षेत्र में सुरक्षा अभियानों, हिंसा, अपहरण और लोगों को जबरन गायब किए जाने के आरोपों को लेकर भी विवाद बना हुआ है। इन मुद्दों का असर आम नागरिकों की सुरक्षा और मानवाधिकारों पर भी पड़ता है।
13 नवंबर को वैश्विक स्तर पर शहीद दिवस मनाने की घोषणा इसी लंबे ऐतिहासिक और राजनीतिक संघर्ष के संदर्भ में सामने आई है। हालांकि, इस आयोजन की वैश्विक भागीदारी और विभिन्न देशों में इसके कार्यक्रमों का विस्तृत ब्योरा संगठन के ऐलान में स्पष्ट नहीं किया गया है।








