भारतीय लोकतंत्र
समाचार-गढ़, 16 अगस्त, श्रीडूंगरगढ़। स्वाधीनता के 76 वर्ष के बाद वर्तमान भारतीय लोकतंत्र का हम गहराई से विश्लेषण करे तो पाएंगे की भारतीय लोकतंत्र अभी शैशवास्था से गुजर रहा है। एक ऐसी अवस्था जहा लोकतंत्र ने ठीक से चलना भी नही सीखा है। कहने को तो हम विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश है किंतु लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों से बहुत दूरी पर खड़े है।
लोकतंत्र की मूल भावना जनता की जागरूकता और सतर्कता से जुड़ी है वही देश की बड़ी आबादी जागरूकता से बहुत दूरी पर खड़ी है। किसी भी देश के लोकतांत्रिक मूल्य उस देश की जनता की शिक्षा और लोगो के नैतिक आचरण पर निर्भर करते है। हमारे देश में दोनो की मूल्य संकुचित होते जा रहे है।
शिक्षा जगत नैतिक मूल्यों में वृद्धि करने में विफल साबित हो रहा है। वर्तमान समय में शिक्षा के नाम पर असंख्य अध्यापकों द्वारा अश्लीलता परोशी जा रही है। समाज का एक तबका इन अनेतिक आचरण वाले शिक्षकों का महिमा मंडन भी कर रहा है। असंख्य ऐसे अध्यापक सोशल मीडिया के शिरमोर बने बैठे है। देश का शिक्षा तंत्र लोकतंत्र के मूल्यों को सहजने में विफल हो रहा है। इन सब की बदौलत समाज नैतिक पतन की और तेज गति से अग्रसर हो रहा है। स्वतंत्रता के नाम पर संस्कृति का हास हो रहा है। नैतिक पतन की यह सीढी समाज के अंतिम छोर के व्यक्ति तक पहुंच गई है।
देश में आदर्शवादी शिक्षको की कमी साफ दिखाई दे रही है। ऐसे शिक्षक जिनका आचरण देश के लिए आदर्श हो जिनका ज्ञान लोकतंत्र को चलना सिखाए।
भारतीय लोकतंत्र पूर्व और पश्चिम के द्वंद्व में फंसकर रह गया है। भारतीय लोकतंत्र और शिक्षा तंत्र को भारतीयकरण की जरूरत है पश्चिमीकरण की नही। हमारा नैतिक उत्थान ऐसा हो जहा अस्पताल के कोने पान व गुटका की पीक से न भरे हो, जहा रेलवे के शौचालय में मग जंजीर से न बंदा हो। जहा स्वच्छ भारत केवल स्लोगन न हो बल्कि हमारी जीवन पद्धति हो।
भारतीय लोकतंत्र तभी पैरो पर खड़ा होगा जब प्रत्येक तत्व में भारतीयता की छाप दिखाई देगी। हमे स्वयं को पूर्व और पश्चिम से श्रेष्ठ मानना भी होगा और साबित भी करना होगा। केवल भावनाओं के ज्वार से हम विश्व गुरु नही बनेंगे बल्कि यथार्थ के नैतिक आदर्श को अपनाकर ही हम विश्व गुरु बन सकते है।
नुजल इस्लाम काजी
वरिष्ठ अध्यापक
राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय सातलेरा, श्रीडूंगरगढ़











