समाचार-गढ़ 20 अक्टूबर, 2026।
Women Reservation News: महिला आरक्षण और लोकसभा की सीटों के परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार और विपक्ष के बीच सियासी खींचतान एक बार फिर तेज हो गई है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर विपक्ष से सहयोग की अपील की है। वहीं, कांग्रेस ने विधेयक पर आगे बढ़ने से पहले सभी दलों की बैठक बुलाने की मांग दोहराई है। अप्रैल में संविधान संशोधन विधेयक लोकसभा में जरूरी बहुमत हासिल नहीं कर पाया था। अब सवाल है कि महिला आरक्षण और परिसीमन के मुद्दे पर कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और अन्य विपक्षी दलों का क्या रुख है?
रिजिजू ने खरगे को पत्र लिखकर क्या कहा?
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने 19 अक्टूबर को कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को पत्र लिखकर कहा कि सरकार ने परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्ताव पर विपक्ष से चर्चा करने के कई प्रयास किए हैं। उन्होंने दावा किया कि सरकार ने कांग्रेस से बातचीत के लिए 16 मार्च, 26 मार्च और 12 अप्रैल को संपर्क किया था। रिजिजू के मुताबिक, अन्य विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों से भी चर्चा की गई है।
रिजिजू ने कांग्रेस से विधेयक पर रचनात्मक सहयोग करने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार महत्वपूर्ण विधायी प्रस्तावों पर सभी दलों की भागीदारी को महत्व देती है। यह पत्र खरगे की उस मांग के जवाब में आया, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से विधेयक पर विचार करने से पहले सर्वदलीय बैठक बुलाने का आग्रह किया था।
अप्रैल में क्यों पारित नहीं हो पाया था विधेयक?
17 अप्रैल 2026 को लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका था। मतदान में विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि 230 सांसदों ने विरोध में मतदान किया। संविधान संशोधन के लिए आवश्यक समर्थन नहीं मिलने के कारण विधेयक पारित नहीं हो पाया। इसके बाद सरकार ने इससे जुड़े अन्य विधेयक भी वापस ले लिए थे।
इस विधेयक में लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को परिसीमन की प्रक्रिया से जोड़ने का प्रस्ताव था। संसद ने 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया था, लेकिन उसके प्रावधानों का क्रियान्वयन परिसीमन और संबंधित संवैधानिक प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ है।
महिला आरक्षण और परिसीमन पर किस पार्टी का क्या रुख?
1. कांग्रेस: मौजूदा 543 सीटों में ही लागू हो आरक्षण
कांग्रेस का कहना है कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों में ही व्यवस्था की जा सकती है। पार्टी परिसीमन से महिला आरक्षण को जोड़ने और लोकसभा की सीटें बढ़ाने के प्रस्ताव पर सवाल उठा रही है।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री से सर्वदलीय बैठक बुलाकर प्रस्ताव पर विस्तार से चर्चा कराने की मांग की है। पार्टी की प्रमुख मांगों में लोकसभा की मौजूदा सीटों की संख्या और राज्यों के बीच सीटों के बंटवारे को 25 साल तक बरकरार रखने का प्रस्ताव भी शामिल है।
2. समाजवादी पार्टी: जातिगत आंकड़ों और प्रतिनिधित्व पर सवाल
समाजवादी पार्टी परिसीमन के प्रस्ताव का विरोध कर चुकी है। पार्टी की चिंता है कि पर्याप्त जनसंख्या और जातिगत आंकड़ों के बिना निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी इस प्रक्रिया और सरकार के प्रस्ताव पर सवाल उठा चुके हैं। ऐसे में पार्टी का रुख विधेयक पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की सरकार की कोशिशों के लिहाज से महत्वपूर्ण है।
3. डीएमके: दक्षिण भारतीय राज्यों के हित अहम
तमिलनाडु की सत्तारूढ़ डीएमके परिसीमन के प्रस्ताव का विरोध कर चुकी है। पार्टी की चिंता है कि यदि लोकसभा की सीटों का बंटवारा मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने वाले दक्षिण भारतीय राज्यों का संसद में सापेक्ष प्रतिनिधित्व प्रभावित हो सकता है।
डीएमके का रुख इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दक्षिण भारत में परिसीमन के संभावित प्रभाव को लेकर राजनीतिक बहस तेज रही है। सरकार की ओर से डीएमके समेत कई विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों से चर्चा किए जाने की जानकारी दी गई है।
4. तृणमूल कांग्रेस: विधेयक का विरोध
तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े सरकार के प्रस्ताव का विरोध कर चुकी हैं। अप्रैल में हुए मतदान के दौरान भी विपक्षी दलों ने विधेयक के खिलाफ रुख अपनाया था।
टीएमसी की आपत्ति केवल महिला आरक्षण के विचार को लेकर नहीं, बल्कि उसे लागू करने के लिए प्रस्तावित परिसीमन और सीटों के पुनर्वितरण की प्रक्रिया को लेकर है। इस मुद्दे पर पार्टी का रुख विपक्षी एकजुटता के लिहाज से अहम माना जाता है।
5. शिवसेना (यूबीटी): परिसीमन के प्रस्ताव पर आपत्ति
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) भी परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव का विरोध कर चुकी है। सरकार के अनुसार, इस मुद्दे पर जिन विपक्षी दलों से बातचीत की गई, उनमें शिवसेना (यूबीटी) भी शामिल है।
हालांकि, चर्चा में शामिल होना विधेयक का समर्थन करने के बराबर नहीं है। पार्टी के अंतिम रुख को लेकर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उसके आधिकारिक बयान और संसदीय निर्णय को देखना जरूरी होगा।
6. एनसीपी (शरदचंद्र पवार): राज्यों के बीच संतुलन की चिंता
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) के लिए भी परिसीमन के दौरान राज्यों के प्रतिनिधित्व का संतुलन अहम मुद्दा है। जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से उन राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ने की आशंका जताई जाती है, जिन्होंने जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने में बेहतर प्रदर्शन किया है।
इसलिए सीटों की संख्या बढ़ाने के किसी भी प्रस्ताव पर राज्यों के बीच समानता और प्रतिनिधित्व के प्रभाव का सवाल बहस के केंद्र में रह सकता है। पार्टी के अंतिम निर्णय को उसके आधिकारिक रुख के आधार पर ही देखा जाना चाहिए।
7. वामपंथी दल: मौजूदा सीटों के भीतर आरक्षण की मांग
वामपंथी दल भी परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव पर आपत्ति जताते रहे हैं। उनका रुख महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया, लोकसभा की सदस्य संख्या और राज्यों के प्रतिनिधित्व के सवालों से जुड़ा है।
कांग्रेस की तरह, मौजूदा सीटों के भीतर महिला आरक्षण लागू करने की मांग विपक्षी बहस का एक प्रमुख हिस्सा रही है। हालांकि, सभी विपक्षी दलों की आपत्तियां एक जैसी नहीं हैं; कुछ दलों का जोर जातिगत आंकड़ों पर है, तो कुछ दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर चिंतित हैं।
आगे क्या होगा?
महिला आरक्षण और परिसीमन पर आगे की राह सरकार और विपक्ष के बीच बातचीत पर निर्भर करेगी। सरकार विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए विपक्ष का सहयोग चाहती है, जबकि कांग्रेस ने सर्वदलीय बैठक और प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा की मांग की है।
इस विवाद के केंद्र में तीन बड़े सवाल हैं—महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण कब और किस प्रक्रिया से लागू होगा, लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने की जरूरत कैसे तय होगी और परिसीमन के बाद विभिन्न राज्यों का प्रतिनिधित्व किस तरह संतुलित रखा जाएगा।
महिला आरक्षण के उद्देश्य पर व्यापक समर्थन होने के बावजूद उसे लागू करने के तरीके पर राजनीतिक सहमति बनना अभी बड़ी चुनौती है। आने वाले दिनों में सरकार की रणनीति और विपक्षी दलों के रुख से इस मुद्दे की अगली दिशा स्पष्ट हो सकती है।








