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बलूचिस्तान में क्यों सुलग रही बगावत? 1948 के विलय से आज की हिंसा तक समझिए पूरी कहानी

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समाचार-गढ़ 14 अगस्त, 2026।

इस्लामाबाद: पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में आज भी आजादी और अधिकारों की मांग को लेकर संघर्ष जारी है। बलूच संगठनों का आरोप है कि पाकिस्तान सरकार और सेना लंबे समय से जबरन गायब किए जाने, हिरासत में हत्याओं, टॉर्चर और संसाधनों के कथित शोषण के जरिए उनकी आवाज दबा रही है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग (HRCP) ने भी अपनी रिपोर्टों में क्षेत्र में मानवाधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं की स्थिति पर चिंता जताई है।

1947 में समझौता, 1948 में पाकिस्तान में विलय

भारत की आजादी के समय कलात की रियासत ने खुद को स्वतंत्र रखने की कोशिश की थी। 11 अगस्त 1947 को कलात और पाकिस्तान के बीच स्टैंडस्टिल समझौता हुआ था। बलूच पक्ष का दावा है कि इसके तहत कलात की स्वतंत्र स्थिति को स्वीकार किया गया था।

लेकिन कुछ ही महीनों बाद स्थिति बदल गई। पाकिस्तान ने कलात पर राजनीतिक और सैन्य दबाव बढ़ाया। आखिरकार 27 मार्च 1948 को कलात के खान मीर अहमद यार खान ने पाकिस्तान में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद से ही बलूच राष्ट्रवादी समूह इसे जबरन विलय बताते हुए स्वतंत्रता की मांग करते रहे हैं।

बलूचों की मुख्य शिकायतें क्या हैं?

बलूच संगठनों की प्रमुख मांगों में—

  • जबरन गायब किए जाने और कथित फर्जी मुठभेड़ों पर रोक
  • मानवाधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता की रक्षा
  • बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों में स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी
  • क्षेत्र में विकास और राजनीतिक अधिकार

शामिल हैं।

संसाधनों से समृद्ध, फिर भी पिछड़ापन

बलूचिस्तान गैस, खनिज और अन्य प्राकृतिक संसाधनों से बेहद समृद्ध है। लेकिन बलूच राष्ट्रवादियों का आरोप है कि इन संसाधनों का फायदा स्थानीय आबादी को पर्याप्त रूप से नहीं मिलता। यही आर्थिक असमानता और राजनीतिक उपेक्षा अलगाववादी भावना को मजबूत करने वाले प्रमुख कारणों में गिनी जाती है।

पाकिस्तान की कार्रवाई और बढ़ता असंतोष

पाकिस्तानी सरकार बलूच विद्रोही संगठनों को सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा मानती है और उनके खिलाफ सैन्य कार्रवाई करती रही है। दूसरी ओर, मानवाधिकार संगठन और बलूच कार्यकर्ता आरोप लगाते हैं कि इस कार्रवाई में आम नागरिकों के अधिकार भी प्रभावित होते हैं।

यही राजनीतिक असंतोष, संसाधनों पर नियंत्रण और मानवाधिकारों से जुड़े आरोप बलूचिस्तान में दशकों से चल रहे संघर्ष को आज भी जिंदा रखे हुए हैं।

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