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भाभी के टिकट के लिए दौड़ता रहा देवर, आखिरी वक्त पत्नी को मिला कांग्रेस का सिंबल

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समाचार-गढ़ 4 सितंबर, 2026।

राजस्थान के जयपुर जिले के जमवारामगढ़ नगर पालिका के वार्ड नंबर 7 में कांग्रेस टिकट को लेकर एक दिलचस्प सियासी घटनाक्रम सामने आया है। ओबीसी महिला के लिए आरक्षित इस सीट पर एक चचेरे देवर ने अपनी भाभी को कांग्रेस का टिकट दिलाने के लिए पैरवी की और यहां तक कि उनके नामांकन पत्र में प्रस्तावक भी बना। लेकिन नामांकन के अंतिम समय में पूरा समीकरण बदल गया।

कांग्रेस ने भाभी की जगह उसी देवर की पत्नी यानी देवरानी को अधिकृत प्रत्याशी घोषित कर दिया। टिकट बदलने के बाद परिवार में नाराजगी और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच असमंजस की स्थिति बन गई।

वार्ड-7 में टिकट को लेकर शुरू हुई थी कवायद

जमवारामगढ़ नगर पालिका का वार्ड नंबर 7 ओबीसी महिला के लिए आरक्षित है। आरक्षण सामने आने के बाद मालावाला गांव में भाजपा और कांग्रेस दोनों ही दलों ने अपने लिए मजबूत उम्मीदवार की तलाश शुरू कर दी थी।

भाजपा ने स्थानीय महिला उम्मीदवार को मैदान में उतारने की तैयारी की, जबकि कांग्रेस में एक चचेरे देवर ने अपनी भाभी को मजबूत दावेदार के तौर पर आगे बढ़ाया।

परिवार और स्थानीय समर्थकों को भी उम्मीद थी कि कांग्रेस का अधिकृत टिकट भाभी को ही मिलेगा।

नामांकन के वक्त तक भाभी के साथ था देवर

टिकट को लेकर मामला इतना आगे बढ़ चुका था कि नामांकन दाखिल करने के अंतिम दिन चचेरा देवर अपनी भाभी के नामांकन पत्र में प्रस्तावक भी बना।

लेकिन कांग्रेस का अंतिम अधिकृत सिंबल सामने आते ही चुनावी तस्वीर बदल गई। पार्टी ने भाभी के बजाय देवर की पत्नी को अपना अधिकृत प्रत्याशी बना दिया।

यानी जिस महिला के लिए देवर टिकट की पैरवी कर रहा था, आखिरी समय में उसी सीट पर कांग्रेस का चुनावी सिंबल उसकी पत्नी के नाम हो गया।

टिकट बदलते ही परिवार में बढ़ी नाराजगी

कांग्रेस के अधिकृत उम्मीदवार के तौर पर देवरानी का नाम सामने आने के बाद परिवार के भीतर नाराजगी की बात सामने आई है। जेठ और जेठानी इस फैसले से नाराज बताए जा रहे हैं।

वहीं, स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच भी कुछ समय के लिए असमंजस की स्थिति बनी रही। कुछ ही घंटे पहले तक भाभी के समर्थन में सक्रिय देवर के सामने अब अपनी पत्नी को चुनाव जिताने की चुनौती है।

देवरानी के सामने दोहरी चुनौती

कांग्रेस की अधिकृत प्रत्याशी बनने के बाद देवरानी के सामने अब चुनावी मैदान में अपनी स्थिति मजबूत करने की चुनौती है।

एक तरफ उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं का समर्थन जुटाना होगा, वहीं दूसरी तरफ परिवार में पैदा हुई नाराजगी को भी संभालना होगा। इसके अलावा वार्ड में भाजपा की प्रत्याशी भी चुनावी मुकाबले में मौजूद हैं।

ऐसे में वार्ड नंबर 7 का मुकाबला सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि एक ही परिवार के भीतर टिकट को लेकर हुए इस अप्रत्याशित बदलाव के कारण भी चर्चा में आ गया है।

मालावाला गांव में चर्चा का विषय बना मामला

भाभी के लिए टिकट की पैरवी करने से लेकर नामांकन में प्रस्तावक बनने और फिर आखिरी समय में पत्नी के अधिकृत प्रत्याशी बन जाने तक का यह पूरा घटनाक्रम मालावाला गांव और जमवारामगढ़ क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।

अब देखना होगा कि परिवार और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच बनी नाराजगी का चुनावी नतीजे पर कितना असर पड़ता है और वार्ड नंबर 7 में कांग्रेस अपनी अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में माहौल बनाने में कितनी सफल रहती है।

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