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BRICS में पाकिस्तान की एंट्री क्यों अटकी? चीन-रूस के समर्थन के बावजूद भारत बना सबसे बड़ी चुनौती

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समाचार-गढ़ 4 सितंबर, 2026।

नई दिल्ली: BRICS में विस्तार की चर्चा के बीच पाकिस्तान की सदस्यता का मुद्दा एक बार फिर सुर्खियों में है। चीन पाकिस्तान को संगठन में शामिल कराने का समर्थन करता रहा है और रूस की ओर से भी उसके पक्ष में सकारात्मक संकेत मिल चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तान अब तक BRICS का पूर्ण सदस्य नहीं बन सका है। सवाल उठ रहा है कि आखिर पाकिस्तान की राह में सबसे बड़ी अड़चन क्या है और क्या भारत की आपत्ति इसकी वजह है?

BRICS का आगामी शिखर सम्मेलन 12-13 तारीख को नई दिल्ली में आयोजित होने वाला है। इसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग समेत सदस्य देशों के शीर्ष नेता हिस्सा लेने वाले हैं।

BRICS में भारत, चीन और रूस की अहम भूमिका

BRICS की शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ हुई थी। बाद में मिस्र, इथियोपिया, ईरान, यूएई, सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देश पूर्ण सदस्य बने।

संगठन के विस्तार के साथ इसकी राजनीतिक और आर्थिक अहमियत भी बढ़ी है। ऐसे में किसी नए देश को शामिल करने का फैसला सिर्फ उसके किसी एक बड़े समर्थक देश की इच्छा से नहीं होता। नए सदस्य को शामिल करने के लिए सदस्य देशों के बीच आम सहमति जरूरी होती है।

यही व्यवस्था पाकिस्तान की सदस्यता के मामले में भी सबसे महत्वपूर्ण बन जाती है।

पाकिस्तान ने 2023 में किया था आवेदन

पाकिस्तान ने अगस्त 2023 में BRICS की सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन किया था। चीन ने खुलकर पाकिस्तान की दावेदारी का समर्थन किया। रूस की ओर से भी पाकिस्तान की सदस्यता को लेकर सकारात्मक संकेत सामने आए।

इसके बावजूद 2024 में रूस की अध्यक्षता में हुए कजान शिखर सम्मेलन के दौरान पाकिस्तान को सदस्य बनाने पर आम सहमति नहीं बन सकी।

यहीं से भारत की भूमिका को लेकर सवाल उठते हैं।

क्या भारत ने पाकिस्तान को रोकने के लिए वीटो किया?

BRICS की प्रक्रिया को सीधे तौर पर “भारत का वीटो” कहना तकनीकी रूप से सही नहीं होगा। संगठन में किसी नए सदस्य को शामिल करने के लिए अलग-अलग देशों के पास संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद जैसी औपचारिक वीटो शक्ति नहीं है।

लेकिन सदस्यता के लिए सर्वसम्मति जरूरी है। इसका मतलब है कि अगर किसी सदस्य देश को किसी प्रस्ताव पर गंभीर आपत्ति है और आम सहमति नहीं बनती, तो सदस्यता रुक सकती है।

भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक और सुरक्षा संबंधों को देखते हुए पाकिस्तान की BRICS सदस्यता के मामले में भारत की सहमति महत्वपूर्ण मानी जाती है।

सीमा पार आतंकवाद और पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा मुद्दों पर भारत का रुख पहले से स्पष्ट रहा है। ऐसे में नई दिल्ली की सहमति के बिना पाकिस्तान के लिए BRICS में प्रवेश हासिल करना बेहद मुश्किल हो सकता है।

चीन का समर्थन भी क्यों नहीं करा पाया पाकिस्तान की एंट्री?

पाकिस्तान को चीन का समर्थन मिलने के बावजूद उसकी सदस्यता इसलिए आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि सिर्फ चीन या रूस का समर्थन पर्याप्त नहीं है।

अगर एक ओर चीन पाकिस्तान के पक्ष में मजबूती से खड़ा हो और दूसरी ओर रूस भी समर्थन करे, तब भी अंतिम फैसला सभी सदस्यों की सहमति पर निर्भर करता है।

यही कारण है कि चीन के मजबूत प्रभाव के बावजूद पाकिस्तान की BRICS सदस्यता का मामला आगे नहीं बढ़ पाया।

आर्थिक कमजोरी भी बन सकती है एक चुनौती

भारत-पाकिस्तान विवाद के अलावा पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति भी उसकी दावेदारी के संदर्भ में चर्चा का विषय रही है।

BRICS की पहचान लंबे समय तक तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के मंच के रूप में रही है। हालांकि अब इसका विस्तार काफी व्यापक हो चुका है, फिर भी किसी देश की आर्थिक क्षमता, व्यापारिक संभावनाएं और वैश्विक आर्थिक भूमिका महत्वपूर्ण पहलू बने हुए हैं।

पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों में महंगाई, विदेशी मुद्रा संकट, भारी कर्ज और आर्थिक अस्थिरता जैसी चुनौतियों से जूझता रहा है। उसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से भी बार-बार आर्थिक सहायता की जरूरत पड़ी है।

हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि पाकिस्तान को सिर्फ आर्थिक कमजोरी के कारण BRICS से बाहर रखा गया है। उपलब्ध आधिकारिक जानकारी में उसकी सदस्यता को रोकने की कोई एक स्पष्ट वजह घोषित नहीं की गई है। 2024 में रूस की ओर से मुख्य रूप से यही कहा गया था कि पाकिस्तान की सदस्यता पर आम सहमति नहीं बन पाई।

BRICS के भीतर भारत-पाकिस्तान विवाद का असर पड़ने का डर

BRICS अब केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित संगठन नहीं रह गया है। इसका वैश्विक राजनीतिक महत्व भी बढ़ा है।

ऐसे में पाकिस्तान को सदस्य बनाने पर भारत-पाकिस्तान के पुराने विवादों का असर BRICS के मंच पर आने की आशंका भी एक अहम पहलू हो सकती है। कश्मीर, आतंकवाद और दोनों देशों के बीच तनाव जैसे मुद्दे संगठन की बैठकों में चर्चा का हिस्सा बन सकते हैं।

इससे BRICS के आर्थिक और विकास संबंधी एजेंडे पर भी राजनीतिक खींचतान हावी होने का खतरा पैदा हो सकता है।

पार्टनर देश बनने का मौका भी हाथ से निकला

पाकिस्तान के लिए चुनौती सिर्फ पूर्ण सदस्यता तक सीमित नहीं रही। 2024 के कजान शिखर सम्मेलन में BRICS ने पार्टनर कंट्री की नई व्यवस्था शुरू की थी।

इसके तहत किसी देश को पूर्ण सदस्य बनाए बिना BRICS के साथ जोड़ा जा सकता है। पाकिस्तान का नाम भी संभावित साझेदार देशों में चर्चा में था, लेकिन जब अंतिम सूची सामने आई तो उसका नाम नहीं था।

1 जनवरी 2025 से बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा और उज्बेकिस्तान BRICS पार्टनर देश बने। बाद में वियतनाम भी इस व्यवस्था में शामिल हुआ।

पार्टनर देशों को लेकर भी प्रक्रिया आम सहमति पर आधारित रही।

तो क्या भारत की मंजूरी के बिना पाकिस्तान की एंट्री मुश्किल है?

मौजूदा व्यवस्था को देखें तो हां, भारत की सहमति के बिना पाकिस्तान की BRICS सदस्यता बेहद मुश्किल होगी। लेकिन इसे सीधे तौर पर “भारत ने वीटो लगा दिया” कहना सही नहीं होगा।

असल मामला BRICS की सर्वसम्मति वाली व्यवस्था से जुड़ा है। जब तक सभी सदस्य देश किसी नए सदस्य को लेकर सहमत नहीं होते, तब तक उसकी एंट्री नहीं हो सकती।

इसलिए चीन और रूस के समर्थन के बावजूद अगर भारत पाकिस्तान की सदस्यता पर सहमत नहीं होता, तो केवल इन दोनों देशों के समर्थन से पाकिस्तान को BRICS में शामिल कराना संभव नहीं होगा।

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