समाचार-गढ़ 21 अक्टूबर, 2026।
Electricity Crisis: देश में बिजली की मांग और कोयले के घटते भंडार ने चिंता बढ़ा दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमतें बढ़ने और रुपये में कमजोरी के चलते विदेश से कोयला मंगाना महंगा पड़ रहा है। ऐसे में सरकार ने बिजली संयंत्रों के लिए आयातित कोयले के इस्तेमाल की योजना फिलहाल टालकर घरेलू उत्पादन और आपूर्ति बढ़ाने पर जोर दिया है। हालांकि, कम कोयला स्टॉक का मतलब यह नहीं है कि देश में तत्काल बिजली कटौती होने वाली है, लेकिन आने वाले दिनों में आपूर्ति बनाए रखना चुनौती बन सकता है।
आधे बिजली संयंत्रों में कोयले का स्टॉक कम
बिजली मंत्रालय और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के आंकड़ों के मुताबिक, देश के कई कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में भंडार जरूरत से काफी नीचे पहुंच गया है। 8 अक्टूबर तक 190 में से 87 संयंत्रों के पास क्रिटिकल स्तर का स्टॉक था। सितंबर के पहले सप्ताह में ऐसे संयंत्रों की संख्या 50 थी।
इन 87 संयंत्रों के पास कुल 2.06 करोड़ टन कोयला था, जबकि अनुशंसित भंडार 6.12 करोड़ टन है। यानी इन संयंत्रों के पास तय मानक का करीब 33 प्रतिशत कोयला ही उपलब्ध था।
वहीं, 17 अक्टूबर तक देश के करीब आधे बिजली संयंत्रों के पास उनकी जरूरत के एक-चौथाई से भी कम कोयला बचा था। हालांकि, ‘क्रिटिकल स्टॉक’ का मतलब यह नहीं है कि किसी संयंत्र में कोयला पूरी तरह खत्म होने वाला है या बिजली उत्पादन तुरंत बंद हो जाएगा।
महंगा कोयला और कमजोर रुपया क्यों बने मुसीबत?
भारत बिजली उत्पादन के लिए बड़े पैमाने पर घरेलू कोयले पर निर्भर है। जरूरत पड़ने पर बिजली संयंत्रों को आयातित कोयला घरेलू कोयले में मिलाने के निर्देश भी दिए जाते रहे हैं। लेकिन इस बार अंतरराष्ट्रीय बाजार में थर्मल कोयले की कीमतें बढ़ने से आयात की लागत पर दबाव है।
इसके साथ रुपये की कमजोरी ने विदेश से कोयला खरीदना और महंगा कर दिया है। कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भी देश के ऊर्जा आयात बिल पर असर डाल रही हैं। ऐसे हालात में सरकार ने फिलहाल आयात पर जोर देने के बजाय घरेलू कोयले का उत्पादन और बिजली संयंत्रों तक उसकी ढुलाई बढ़ाने का रास्ता चुना है।
सितंबर में बिजली की कमी एक दशक के खराब स्तर पर
कमजोर मानसून के बाद गर्मी का असर लंबे समय तक बने रहने से बिजली की खपत बढ़ी है। एयर कंडीशनर और कूलिंग उपकरणों के इस्तेमाल के साथ सिंचाई के लिए भी बिजली की मांग बनी रही। दूसरी ओर, कम बारिश के कारण जलविद्युत उत्पादन पर दबाव पड़ा।
इसका असर सितंबर में दिखाई दिया, जब देश में बिजली की कमी करीब एक दशक के सबसे खराब स्तर पर पहुंच गई। बिजली की मांग पूरी करने के लिए कोयला आधारित बिजली संयंत्रों पर निर्भरता बढ़ी, जिससे कोयले के भंडार पर और दबाव पड़ा।
अक्टूबर में थोड़ी राहत, स्टॉक घटने की रफ्तार धीमी
अक्टूबर में कोयले के भंडार में गिरावट की रफ्तार कुछ कम हुई है। ब्लूमबर्ग की बिजली मंत्रालय के आंकड़ों पर आधारित गणना के अनुसार, 1 से 17 अक्टूबर के बीच बिजली संयंत्रों में कोयले का औसत स्टॉक रोजाना करीब 48,000 टन घटा। यह सितंबर में दर्ज गिरावट की रफ्तार से लगभग पांच गुना कम थी।
सरकार को उम्मीद है कि तापमान गिरने के साथ बिजली की मांग में कमी आएगी और संयंत्रों में कोयले का भंडार दोबारा बढ़ने लगेगा। हालांकि, तापमान सामान्य से ऊपर रहने की स्थिति में बिजली की मांग पर दबाव बना रह सकता है।
सरकार ने कोयले की आपूर्ति बढ़ाने के लिए क्या किया?
कोयले की संभावित कमी से निपटने के लिए सरकार ने उत्पादन और परिवहन व्यवस्था मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। प्रमुख कदम इस प्रकार हैं:
- कोल इंडिया को निर्देश: सरकारी कंपनी को कोयले का उत्पादन बढ़ाने और बिजली क्षेत्र की जरूरत पूरी करने पर जोर देने को कहा गया है।
- रेलवे से ढुलाई बढ़ाई: अक्टूबर में कोयले की ढुलाई औसतन 465 से ज्यादा रेक प्रतिदिन तक पहुंच गई। लगातार तीन दिन 470 रेक का लक्ष्य भी हासिल किया गया।
- कैप्टिव संयंत्रों को पूरी क्षमता से चलाने का आदेश: 100 से अधिक कैप्टिव कोयला आधारित बिजली संयंत्रों को 1 अक्टूबर से साल के अंत तक पूरी क्षमता से चलाने को कहा गया है।
- आपूर्ति में बढ़ोतरी: कोयला मंत्रालय के अनुसार, बिजली क्षेत्र को रोजाना होने वाली कोयले की आपूर्ति सितंबर के मुकाबले करीब 36 प्रतिशत बढ़ी है।
सरकार का मानना है कि रेलवे से रोजाना 465 से 475 रेक कोयले की ढुलाई बनाए रखने से भंडार को स्थिर करने और आगामी त्योहारों, सर्दियों तथा अगली गर्मियों की मांग के लिए स्टॉक बढ़ाने में मदद मिलेगी।
क्या देश में बिजली कटौती का खतरा है?
कोयले का कम भंडार चिंता का विषय जरूर है, लेकिन इससे देशभर में तत्काल बिजली संकट या व्यापक कटौती की पुष्टि नहीं होती। बिजली संयंत्रों की स्थिति पर नजर रखी जा रही है और जरूरत के मुताबिक कोयले की आपूर्ति को अलग-अलग संयंत्रों के बीच समायोजित किया जा रहा है।
फिलहाल सरकार की रणनीति घरेलू उत्पादन बढ़ाने, रेलवे के जरिए तेज ढुलाई और उपलब्ध कोयले का बेहतर प्रबंधन करने पर केंद्रित है। आने वाले दिनों में बिजली की मांग, तापमान और कोयले की आपूर्ति की स्थिति तय करेगी कि भंडार कितनी जल्दी सुधरता है।








