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Airport Privatisation: वाराणसी-अमृतसर समेत 11 एयरपोर्ट होंगे निजी हाथों में, मोनोपॉली रोकने के लिए सरकार का बड़ा प्लान!

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समाचार गढ़ 22 अक्टूबर 2026।

केंद्र सरकार देश के 11 एयरपोर्ट के संचालन और विकास की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को सौंपने की तैयारी कर रही है। इस सूची में वाराणसी, अमृतसर, रायपुर, भुवनेश्वर और तिरुचिरापल्ली जैसे प्रमुख एयरपोर्ट शामिल हैं। खास बात यह है कि सरकार इस बार एयरपोर्ट को अलग-अलग बेचने के बजाय पांच समूहों में बांटकर 50 साल की रियायत अवधि के लिए निजी कंपनियों को सौंपने की योजना बना रही है।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती भी है—एयरपोर्ट कारोबार पर कुछ चुनिंदा कंपनियों का दबदबा बढ़ने से रोकना। इसी वजह से एक बोलीदाता को कितने एयरपोर्ट समूह मिल सकेंगे, इसकी सीमा तय करने की तैयारी है।

दिसंबर तक शुरू हो सकती है बोली प्रक्रिया

सरकार इस योजना में घरेलू और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की भागीदारी बढ़ाना चाहती है। इसके लिए मुंबई के अलावा दुबई और सिंगापुर जैसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्रों में रोडशो आयोजित करने की योजना है। इन कार्यक्रमों के जरिए संभावित निवेशकों को एयरपोर्ट के समूहों में बांटने की व्यवस्था समझाई जाएगी और उनसे सुझाव भी लिए जाएंगे।

रिपोर्ट के मुताबिक, बोली प्रक्रिया दिसंबर 2026 तक शुरू होने की उम्मीद है। सरकार का लक्ष्य वित्त वर्ष 2026-27 के अंत तक सौदों को अंतिम रूप देना है। हालांकि, यह प्रस्तावित समयसीमा है और प्रक्रिया पूरी होने की तारीख में बदलाव संभव है।

पांच समूहों में बांटे जाएंगे 11 एयरपोर्ट

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) की योजना के तहत बड़े एयरपोर्ट के साथ छोटे एयरपोर्ट को जोड़ा जाएगा। इसका उद्देश्य बड़े एयरपोर्ट से होने वाली कमाई के जरिए छोटे एयरपोर्ट की वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाना है।

प्रस्तावित पांच समूह इस प्रकार हैं:

  • अमृतसर समूह: अमृतसर और कांगड़ा-गग्गल एयरपोर्ट
  • वाराणसी समूह: वाराणसी, गया और कुशीनगर एयरपोर्ट
  • भुवनेश्वर समूह: भुवनेश्वर और हुबली एयरपोर्ट
  • रायपुर समूह: रायपुर और औरंगाबाद एयरपोर्ट
  • तिरुचिरापल्ली समूह: तिरुचिरापल्ली और तिरुपति एयरपोर्ट

इन एयरपोर्ट का संचालन, प्रबंधन और विकास 50 साल की रियायत अवधि के तहत निजी कंपनियों को सौंपने का प्रस्ताव है।

अडानी और GMR के अलावा नए निवेशकों पर भी नजर

सरकार को उम्मीद है कि इस बोली प्रक्रिया में मौजूदा एयरपोर्ट ऑपरेटरों के साथ नए निवेशक भी हिस्सा लेंगे। संभावित दावेदारों में अडानी ग्रुप और GMR ग्रुप जैसे बड़े ऑपरेटरों के अलावा पश्चिम एशिया के सॉवरेन वेल्थ फंड और JSW ग्रुप जैसे भारतीय कॉरपोरेट घराने भी शामिल हो सकते हैं।

फिलहाल अडानी ग्रुप देश का सबसे बड़ा निजी एयरपोर्ट ऑपरेटर है, जबकि GMR ग्रुप दिल्ली और हैदराबाद समेत कई एयरपोर्ट का संचालन करता है। ऐसे में नई बोली प्रक्रिया में निवेशकों की भागीदारी और कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा पर नजर रहेगी। हालांकि, संभावित निवेशकों की दिलचस्पी का मतलब यह नहीं है कि उन्होंने बोली जमा कर दी है या उन्हें एयरपोर्ट आवंटित हो गए हैं।

मोनोपॉली रोकने के लिए क्या है सरकार का प्लान?

इस निजीकरण प्रक्रिया का एक अहम पहलू यह है कि सरकार एक ही कंपनी को मिलने वाले एयरपोर्ट समूहों की संख्या पर सीमा लगाने की तैयारी कर रही है। चिंता यह है कि अगर कुछ कंपनियों के पास बहुत अधिक एयरपोर्ट आ गए, तो बाजार में प्रतिस्पर्धा कमजोर हो सकती है और कारोबार कुछ बड़े समूहों तक सीमित रह सकता है।

इसी जोखिम को कम करने के लिए एक बोलीदाता कितने समूहों के लिए बोली लगा सकेगा या कितने समूह हासिल कर सकेगा, इससे जुड़े नियम तय किए जा रहे हैं। इन नियमों का मकसद बाजार में किसी एक कंपनी का अत्यधिक दबदबा बनने और जरूरत से ज्यादा कर्ज लेकर कई परियोजनाएं संभालने से पैदा होने वाले जोखिमों को सीमित करना है।

क्या बदलेगा इस योजना से?

सरकार की योजना के तहत निजी कंपनियों को एयरपोर्ट के संचालन और विकास की जिम्मेदारी मिलेगी, जबकि छोटे एयरपोर्ट को बड़े एयरपोर्ट के साथ जोड़कर उनकी वित्तीय व्यवहार्यता बेहतर बनाने की कोशिश होगी। सरकार के सामने चुनौती यह सुनिश्चित करना भी है कि निजी निवेश बढ़ने के साथ बाजार में प्रतिस्पर्धा बनी रहे।

अभी यह प्रक्रिया प्रस्ताव और बोली की तैयारी के चरण में है। इसलिए यह कहना जल्दबाजी होगी कि किन कंपनियों को ये एयरपोर्ट मिलेंगे या यात्रियों के लिए सेवाओं और शुल्क में क्या बदलाव आएगा। अंतिम तस्वीर बोली प्रक्रिया और तय होने वाली शर्तों के बाद ही स्पष्ट होगी।

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