समाचार गढ़ 22 अक्टूबर 2026।
छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के जिन दूरदराज गांवों में कभी नक्सलियों के डर और दुर्गम रास्तों के कारण पहुंचना मुश्किल था, वहां अब स्वास्थ्य विभाग की टीमें रात तक पहुंचकर लोगों के आयुष्मान कार्ड बना रही हैं। हालात ऐसे हैं कि कई गांवों में दिन के समय लोगों के घर पर नहीं मिलने के कारण टीमों को शाम तक इंतजार करना पड़ता है। वहीं, कहीं पहाड़ी रास्तों पर बाइक नहीं चढ़ पाती, तो कहीं नेटवर्क नहीं मिलने से ग्रामीणों को दूसरे गांव तक ले जाना पड़ता है।
यह पहल दिखाती है कि दूरस्थ और आदिवासी इलाकों में सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ पहुंचाने के लिए प्रशासन को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
रात 10 बजे तक गांवों में चल रहा काम
सुकमा जिले के गादीरास सेक्टर के एतपाल गांव में स्वास्थ्य टीम आयुष्मान कार्ड बनाने पहुंची। लेकिन दिन के समय कई ग्रामीण गांव में नहीं मिले। खेती-किसानी और दूसरे कामों के कारण लोग बाहर गए हुए थे। ऐसे में टीम ने उनके लौटने का इंतजार किया और शाम को स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर कार्ड बनाने का काम शुरू किया। यह काम रात करीब 10 बजे तक चला।
नक्सल प्रभावित इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं को लोगों तक पहुंचाने के लिए केवल गांव तक पहुंचना ही काफी नहीं है, बल्कि ग्रामीणों की उपलब्धता और तकनीकी सुविधाओं का ध्यान रखना भी जरूरी है। इसी वजह से स्वास्थ्य टीमों को कई बार अपने काम का समय बदलना पड़ता है।
बाइक पहाड़ी पर नहीं चढ़ी, टीम को लगाना पड़ा जोर
2 सितंबर को दो स्वास्थ्यकर्मी गादीरास क्षेत्र के दुर्गम पहाड़ी इलाके में आयुष्मान कार्ड बनाने निकले। रास्ता इतना कठिन था कि उनकी बाइक पहाड़ी पर नहीं चढ़ सकी। इसके बाद बाइक को धक्का देकर ऊपर ले जाना पड़ा।
रास्ते में वाहन का टायर भी फट गया। टीम ने स्टेपनी बदली और फिर आगे बढ़कर अपना काम पूरा किया। इस दौरान 56 आयुष्मान कार्ड बनाए गए।
यह घटना बताती है कि दूरदराज के गांवों तक स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ पहुंचाने में कर्मचारियों को सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि भौगोलिक और परिवहन संबंधी मुश्किलों से भी जूझना पड़ता है।
नेटवर्क नहीं मिला तो 25 किलोमीटर दूर ले जाना पड़ा
सुकमा के चिंतागुफा क्षेत्र के पालाचलम गांव में भी आयुष्मान कार्ड बनाने के दौरान नेटवर्क की समस्या सामने आई। गांव में मोबाइल नेटवर्क उपलब्ध नहीं होने के कारण कार्ड बनाने की प्रक्रिया पूरी करना मुश्किल हो गया।
ऐसे में ग्रामीणों को ट्रैक्टर में बैठाकर करीब 25 किलोमीटर दूर किस्टाराम ले जाया गया, जहां नेटवर्क उपलब्ध था। वहां 35 ग्रामीणों के आयुष्मान कार्ड बनाए गए।
यह उदाहरण दिखाता है कि डिजिटल सेवाओं पर निर्भर योजनाओं को दूरस्थ इलाकों तक पहुंचाने के लिए इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क जैसी बुनियादी सुविधाएं कितनी महत्वपूर्ण हैं।
मार्च 2027 तक सभी पात्र लोगों को कार्ड देने का लक्ष्य
सुकमा के कलेक्टर अमित कुमार के मुताबिक, पिछले दो महीनों में 10,000 से ज्यादा आयुष्मान कार्ड बनाए गए हैं। प्रशासन का लक्ष्य मार्च 2027 तक सभी पात्र हितग्राहियों के आयुष्मान कार्ड बनाने का है।
यदि किसी व्यक्ति का कार्ड नहीं बन पा रहा है, तो उसके आधार कार्ड की जानकारी अपडेट है या नहीं, इसकी भी जांच की जा रही है। यानी अभियान में कार्ड बनाने के साथ-साथ दस्तावेजों से जुड़ी समस्याओं को दूर करने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।
आदिवासी परिवारों के लिए क्यों अहम है आयुष्मान कार्ड?
दूरदराज और आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी परिवारों के लिए गंभीर बीमारी के समय बड़े अस्पताल में इलाज कराना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। आयुष्मान भारत योजना पात्र परिवारों को सूचीबद्ध अस्पतालों में निर्धारित शर्तों के तहत कैशलेस इलाज की सुविधा देती है।
जिला परियोजना समन्वयक अमृतोष सिंह ठाकुर के मुताबिक, ऐसे परिवारों के लिए आयुष्मान कार्ड स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम है। हालांकि, कार्ड बनना अपने आप में इलाज की गारंटी नहीं है। योजना का लाभ पात्रता, निर्धारित नियमों और सूचीबद्ध अस्पतालों में उपलब्ध सुविधाओं के अनुसार मिलता है।
सुकमा में चल रही यह पहल बताती है कि किसी सरकारी योजना को जमीन पर लागू करने के लिए सिर्फ योजना की घोषणा पर्याप्त नहीं होती। दुर्गम रास्तों, नेटवर्क की कमी और ग्रामीणों की दिनचर्या जैसी बाधाओं को पार करके ही इसका लाभ जरूरतमंद लोगों तक पहुंचाया जा सकता है।








