समाचार गढ़ 22 अक्टूबर 2026।
भारतीय नौसेना की ताकत बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया जा रहा है। फ्रांस में बने राफेल-Marine यानी राफेल-M लड़ाकू विमानों के परीक्षण गोवा में शुरू हो गए हैं। इन ट्रायल का मकसद यह जांचना है कि विमान को भारत के विमानवाहक पोत INS विक्रांत से संचालित करने के लिए किन तकनीकी बदलावों और व्यवस्थाओं की जरूरत है। सफल परीक्षणों के बाद यह विमान भारतीय नौसेना की समुद्र में हवाई युद्ध क्षमता को मजबूत करने में अहम भूमिका निभा सकता है।
गोवा में कहां हो रहे हैं राफेल-M के ट्रायल?
राफेल-M के परीक्षण गोवा स्थित INS हंसा के शोर-बेस्ड टेस्ट फैसिलिटी (SBTF) में किए जा रहे हैं। यह सुविधा विमानवाहक पोत के टेकऑफ के लिए इस्तेमाल होने वाले स्की-जंप रैंप की नकल तैयार करती है। इससे यह परखा जा सकता है कि राफेल-M भारतीय विमानवाहक पोतों की व्यवस्था के अनुरूप उड़ान भरने और संचालन की आवश्यकताओं को पूरा करता है या नहीं।
भारत के INS विक्रांत और INS विक्रमादित्य, दोनों विमानवाहक पोतों पर कम दूरी से उड़ान भरने और अरेस्टर वायर की मदद से उतरने वाली व्यवस्था है। राफेल-M को फ्रांस के विमानवाहक पोत से संचालन के लिए विकसित किया गया है, इसलिए भारतीय पोतों पर इसके संचालन की उपयुक्तता की जांच महत्वपूर्ण है।
भारत ने फ्रांस से खरीदे हैं 26 राफेल-M विमान
भारत और फ्रांस ने 28 अप्रैल 2025 को भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल-M विमानों की खरीद का समझौता किया था। लगभग 63,000 करोड़ रुपये के इस रक्षा सौदे में 22 सिंगल-सीटर और चार ट्विन-सीटर विमान शामिल हैं। पैकेज में प्रशिक्षण, सिम्युलेटर, संबंधित उपकरण, हथियार और रखरखाव से जुड़ी सहायता भी शामिल है।
शुरुआती योजना के मुताबिक, विमानों की डिलीवरी 2030 तक पूरी की जानी थी। हालांकि, हालिया रिपोर्टों में पहली डिलीवरी 2028 के अंत या 2029 की शुरुआत में होने की संभावना बताई गई है। अंतिम डिलीवरी कार्यक्रम के लिए आधिकारिक अनुबंध और नौसेना की ओर से जारी अपडेट को ही निर्णायक माना जाना चाहिए।
राफेल-M की खासियत क्या है?
राफेल-M फ्रांस की कंपनी दसॉल्ट एविएशन का बनाया कैरियर-आधारित, दो इंजन वाला मल्टीरोल लड़ाकू विमान है। इसे समुद्री वातावरण में अलग-अलग तरह के सैन्य मिशन करने के लिए तैयार किया गया है। इसके नौसैनिक संस्करण में विमानवाहक पोत पर संचालन के लिए विशेष संरचनात्मक बदलाव किए गए हैं।
इसकी प्रमुख क्षमताएं हैं:
- विमानवाहक पोत से संचालन: मजबूत लैंडिंग गियर और लैंडिंग हुक की मदद से यह विमान कैरियर पर उतरने के लिए डिजाइन किया गया है। भारतीय पोतों पर इसके संचालन की अनुकूलता जांचने के लिए मौजूदा ट्रायल अहम हैं।
- आधुनिक रडार और सेंसर: राफेल परिवार में AESA रडार और उन्नत सेंसर प्रणाली जैसी क्षमताएं हैं, जो हवाई तथा सतह पर मौजूद लक्ष्यों का पता लगाने और उन्हें ट्रैक करने में मदद करती हैं।
- इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर: SPECTRA प्रणाली रडार और अन्य खतरों की पहचान करने, चेतावनी देने और इलेक्ट्रॉनिक प्रतिरोधी उपायों में सहायता करती है।
- हवा में ईंधन भरने की क्षमता: इससे मिशन की अवधि और विमान की परिचालन पहुंच बढ़ाने में मदद मिलती है।
- विभिन्न मिशन: राफेल परिवार को हवाई मुकाबले, जमीनी और समुद्री लक्ष्यों के खिलाफ कार्रवाई जैसे कई प्रकार के मिशनों के लिए बनाया गया है। हालांकि, किसी खास मिसाइल या हथियार को भारतीय नौसेना के विमान पर उपलब्ध मानने से पहले उसके अनुबंध और एकीकरण की स्थिति देखना जरूरी है।
INS विक्रांत और INS विक्रमादित्य को क्या फायदा होगा?
राफेल-M की नौसेना में तैनाती से भारत के दोनों विमानवाहक पोतों की हवाई युद्ध क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है। आधुनिक लड़ाकू विमान समुद्र में हवाई निगरानी, अपने बेड़े की सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर विभिन्न सैन्य अभियानों में योगदान दे सकते हैं।
यह खरीद भारतीय वायुसेना के राफेल बेड़े के साथ प्रशिक्षण और कुछ लॉजिस्टिक व्यवस्थाओं में समानता का लाभ भी दे सकती है। भारत-फ्रांस समझौते में स्वदेशी हथियारों को विमान के साथ एकीकृत करने के लिए तकनीक हस्तांतरण का प्रावधान भी शामिल है।
ट्रायल सफल होना क्यों जरूरी है?
गोवा में हो रहे परीक्षण केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं हैं। इनसे यह समझने में मदद मिलेगी कि राफेल-M को भारतीय विमानवाहक पोतों की बनावट और संचालन व्यवस्था के अनुसार इस्तेमाल करने के लिए किन बदलावों की आवश्यकता पड़ सकती है। विमान के आकार, डेक पर जगह और संचालन से जुड़ी जरूरतों का आकलन भी इस प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है।
फिलहाल ट्रायल जारी हैं, इसलिए विमान की भारतीय नौसेना में पूर्ण परिचालन तैनाती को पूरा हुआ नहीं माना जा सकता। परीक्षणों के नतीजे, जरूरी बदलाव और विमानों की डिलीवरी आगे की प्रक्रिया तय करेंगे।








