समाचार-गढ़ 3 अक्टूबर, 2026।
BJP Politics: भारतीय जनता पार्टी की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए उसके पुराने वैचारिक सफर पर नजर डालना जरूरी है। 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना से लेकर 1980 में बीजेपी के गठन, राम जन्मभूमि आंदोलन, अटल-आडवाणी के दौर की गठबंधन राजनीति और 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व तक पार्टी की राजनीति में कई बड़े बदलाव आए।
एक दौर में बीजेपी ने गांधीवादी समाजवाद और सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता को अपनी प्रमुख प्रतिबद्धताओं में शामिल किया, तो बाद में राम जन्मभूमि आंदोलन उसके राजनीतिक विस्तार का महत्वपूर्ण आधार बना। मोदी युग में हिंदुत्व के साथ राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाएं, विकास और मजबूत नेतृत्व को भी राजनीतिक नैरेटिव का हिस्सा बनाया गया।
अब सवाल यह है कि अयोध्या और अनुच्छेद 370 जैसे पुराने मुद्दों पर महत्वपूर्ण कदमों के बाद बीजेपी की वैचारिक राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी?
जनसंघ से बीजेपी तक का सफर
1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने भारतीय जनसंघ की स्थापना की। जनसंघ की राजनीति में राष्ट्रीय एकीकरण, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और जम्मू-कश्मीर का पूर्ण एकीकरण प्रमुख मुद्दों में शामिल रहे। दीनदयाल उपाध्याय ने 1965 में ‘एकात्म मानववाद’ को पार्टी की वैचारिक आधारभूमि के रूप में सामने रखा।
1980 में जनता पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ और अटल बिहारी वाजपेयी इसके पहले अध्यक्ष बने। शुरुआती दौर में बीजेपी ने ‘पंचनिष्ठा’ के तहत राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय एकीकरण, लोकतंत्र, गांधीवादी समाजवाद, सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता और मूल्य आधारित राजनीति को अपनी प्रमुख प्रतिबद्धताओं में रखा।
लेकिन 1984 के लोकसभा चुनाव में पार्टी महज 2 सीटों पर सिमट गई। इसके बाद पार्टी की वैचारिक और राजनीतिक दिशा में बदलाव का दौर शुरू हुआ। 1989 में बीजेपी 85 सीटों तक पहुंची और 1991 के लोकसभा चुनाव में उसके खाते में 120 सीटें आईं।
आडवाणी की रथयात्रा और राम जन्मभूमि आंदोलन
बीजेपी के राजनीतिक विस्तार में राम जन्मभूमि आंदोलन एक महत्वपूर्ण मोड़ बना। जून 1989 में पालमपुर में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने राम जन्मभूमि को लेकर प्रस्ताव पारित किया। इसके बाद लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या तक की रथयात्रा ने इस मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया।
23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में आडवाणी को हिरासत में लिया गया। इसके अगले साल हुए लोकसभा चुनाव में बीजेपी 120 सीटों तक पहुंची। दिसंबर 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा गिराए जाने के बाद देश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया और राम मंदिर का मुद्दा बीजेपी की राजनीतिक पहचान से गहराई से जुड़ गया।
हालांकि, सत्ता तक पहुंचने के लिए पार्टी को व्यापक गठबंधन बनाने की जरूरत भी पड़ी। 1996 में बीजेपी 161 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, लेकिन सरकार ज्यादा समय तक नहीं चल सकी। 1998 और 1999 में पार्टी 182 सीटों पर रही। इसी दौर में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में NDA के जरिए गठबंधन की राजनीति मजबूत हुई।
गठबंधन सरकार में साझा एजेंडे को प्राथमिकता देने के कारण बीजेपी के कई वैचारिक मुद्दे सरकार के कॉमन एजेंडे का हिस्सा नहीं बने। इस दौर ने पार्टी की राजनीति में वैचारिक मुद्दों के साथ गठबंधन और सत्ता प्रबंधन की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बनाया।
2014 के बाद बदला राजनीतिक मॉडल
2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी ने पहली बार अपने दम पर लोकसभा में बहुमत हासिल किया और 282 सीटें जीतीं। 2019 में पार्टी की सीटें बढ़कर 303 हुईं। वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 240 सीटों पर रही और केंद्र में सरकार बनाने के लिए NDA सहयोगियों के समर्थन की जरूरत पड़ी।
मोदी युग में बीजेपी की राजनीति केवल हिंदुत्व के मुद्दों तक सीमित नहीं रही। राष्ट्रवाद, कल्याणकारी योजनाएं, इंफ्रास्ट्रक्चर, गरीबों तक सरकारी योजनाओं की पहुंच और मजबूत नेतृत्व के साथ सांस्कृतिक पहचान को भी राजनीतिक नैरेटिव में जोड़ा गया।
इसी अवधि में पार्टी के लंबे समय से चले आ रहे कुछ प्रमुख वैचारिक मुद्दों पर महत्वपूर्ण संवैधानिक और कानूनी कदम हुए। अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के प्रावधानों में बदलाव किया गया। नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले के बाद केंद्र सरकार ने फरवरी 2020 में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया।
इसके अलावा नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA 2019 में पारित हुआ और इसके नियम मार्च 2024 में अधिसूचित किए गए। बीजेपी ने 2024 के घोषणापत्र में CAA को लागू करने और समान नागरिक संहिता यानी UCC के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी दोहराई।
इस लिहाज से राम मंदिर और अनुच्छेद 370 बीजेपी के उन पुराने प्रमुख मुद्दों में हैं जिन पर पिछले वर्षों में महत्वपूर्ण कदम हो चुके हैं, जबकि UCC अभी भी पार्टी के घोषित एजेंडे में शामिल है।
काशी और मथुरा पर क्या है बीजेपी की आधिकारिक स्थिति?
अयोध्या के बाद काशी के ज्ञानवापी और मथुरा के कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह विवाद राजनीतिक और कानूनी विमर्श में बने हुए हैं। हालांकि, इन्हें बीजेपी का आधिकारिक अगला राष्ट्रीय एजेंडा कहना फिलहाल तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
मई 2022 में तत्कालीन बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा से जब काशी और मथुरा को पार्टी के एजेंडे को लेकर सवाल पूछा गया था, तो उन्होंने कहा था कि पार्टी ने पालमपुर में राम जन्मभूमि को लेकर प्रस्ताव पारित किया था, लेकिन उसके बाद काशी और मथुरा को लेकर ऐसा कोई राष्ट्रीय कार्यकारिणी प्रस्ताव नहीं हुआ। उन्होंने कहा था कि ऐसे मामलों का फैसला संविधान और अदालतों के अनुसार होगा और बीजेपी अदालत के फैसले का पालन करेगी।
यानी काशी और मथुरा के मुद्दे राजनीतिक बहस का हिस्सा जरूर हैं, लेकिन उन्हें बीजेपी के घोषित अगले चुनावी या वैचारिक एजेंडे के रूप में पेश करना पार्टी की आधिकारिक स्थिति से आगे जाना होगा।
2029 से पहले बीजेपी की राजनीति का अगला पड़ाव?
अयोध्या और अनुच्छेद 370 जैसे मुद्दों पर महत्वपूर्ण कदमों के बाद UCC, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, विकास, कल्याणकारी योजनाएं और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषय बीजेपी की राजनीति में मौजूद हैं। दूसरी ओर काशी और मथुरा से जुड़े विवाद अदालतों में विचाराधीन हैं।
इसलिए 2029 से पहले बीजेपी की राजनीति का अगला वैचारिक पड़ाव क्या होगा, इसका निश्चित निष्कर्ष अभी निकालना जल्दबाजी होगी। फिलहाल उपलब्ध आधिकारिक बयानों से इतना स्पष्ट है कि काशी और मथुरा को लेकर पार्टी ने राम जन्मभूमि की तरह कोई राष्ट्रीय कार्यकारिणी प्रस्ताव पारित नहीं किया है और इन विवादों में अदालत तथा संविधान की भूमिका को पार्टी नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया है।








