विश्व जूनियर स्क्वैश चैंपियन बनने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनीं, 15 साल बाद मिस्र का दबदबा भी खत्म किया।
समाचार-गढ़ 25 जुलाई 2026।
कुछ कहानियां सिर्फ पदक जीतने की नहीं होतीं, बल्कि उन फैसलों की होती हैं जो पूरी जिंदगी बदल देते हैं। दिल्ली की 18 वर्षीय अनाहत सिंह ने ऐसा ही इतिहास रच दिया है। कनाडा में आयोजित विश्व जूनियर स्क्वैश चैंपियनशिप के फाइनल में उन्होंने मिस्र की दूसरी वरीयता प्राप्त रुकय्या सालेम को 11-3, 11-7, 11-9 से हराकर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया।
इस जीत के साथ अनाहत सिंह विश्व जूनियर स्क्वैश चैंपियन बनने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बन गई हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने इस प्रतियोगिता में करीब 15 वर्षों से चले आ रहे मिस्र के दबदबे को भी समाप्त कर दिया।
लेकिन इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे एक बेहद प्रेरणादायक कहानी छिपी है।
साल 2014 में दिल्ली में आयोजित इंडिया ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट के दौरान छह साल की अनाहत स्टैंड में बैठकर पीवी सिंधु का खेल देख रही थीं। सिंधु के शानदार प्रदर्शन से प्रेरित होकर उन्होंने भी बैडमिंटन खिलाड़ी बनने का सपना देखा और उसी खेल से अपने सफर की शुरुआत की।
इसी दौरान बड़ी बहन अमीरा सिंह के साथ स्क्वैश कोर्ट जाना शुरू हुआ। शुरुआत केवल शौक से हुई, लेकिन धीरे-धीरे स्क्वैश उनकी पहचान बन गया। कुछ समय तक दोनों खेल साथ चलते रहे, लेकिन जब एक खेल चुनने का समय आया, तब महज आठ साल की उम्र में अनाहत ने बैडमिंटन छोड़कर स्क्वैश को अपना भविष्य बना लिया। यही फैसला आगे चलकर भारतीय खेल इतिहास में दर्ज हो गया।
अनाहत पहली बार वर्ष 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में सुर्खियों में आईं, जहां वह भारतीय दल की सबसे कम उम्र की खिलाड़ी थीं। उस समय उन्होंने स्वीकार किया था कि बड़े मंच का दबाव उन्हें महसूस हो रहा था, लेकिन उन्होंने अपने प्रदर्शन से यह साबित कर दिया कि वह लंबे समय तक भारतीय स्क्वैश की नई पहचान बनने वाली हैं।
भारत पिछले 21 वर्षों से इस खिताब का इंतजार कर रहा था। वर्ष 2005 में जोशना चिनप्पा फाइनल तक पहुंची थीं, लेकिन ट्रॉफी जीतने से चूक गई थीं। अब अनाहत सिंह ने वह अधूरा सपना पूरा कर दिया और पहली बार विश्व जूनियर स्क्वैश चैंपियनशिप का स्वर्ण भारत की झोली में डाल दिया।
यह जीत सिर्फ एक खिलाड़ी की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय स्क्वैश के लिए एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है। जिस बच्ची ने कभी पीवी सिंधु को देखकर बैडमिंटन खिलाड़ी बनने का सपना देखा था, आज वही दुनिया को यह बता रही है कि सपने अपना रास्ता बदल सकते हैं, लेकिन मंजिल नहीं।










