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7 साल बाद उत्तर कोरिया पहुंचेंगे शी चिनफिंग, किम जोंग उन से मुलाकात पर दुनिया की नजर

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समाचार गढ़ 7 जून 2026। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग सात वर्षों के अंतराल के बाद उत्तर कोरिया की यात्रा पर जा रहे हैं। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब वैश्विक भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं और रूस, चीन, अमेरिका तथा उत्तर कोरिया के बीच नए रणनीतिक समीकरण उभर रहे हैं। प्योंगयांग में शी चिनफिंग और किम जोंग उन के बीच होने वाली मुलाकात को क्षेत्रीय और वैश्विक राजनीति के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

सितंबर 2025 में द्वितीय विश्व युद्ध से जुड़े एक कार्यक्रम के दौरान किम जोंग उन ने बीजिंग का दौरा किया था। इसके बाद दोनों नेताओं के बीच यह पहली आमने-सामने की मुलाकात होगी। माना जा रहा है कि यह बैठक उत्तर कोरिया और चीन के पारंपरिक संबंधों को नई मजबूती दे सकती है। वहीं चीन यह संदेश भी देना चाहता है कि प्योंगयांग पर उसका प्रभाव अब भी बरकरार है।

हाल के वर्षों में उत्तर कोरिया और रूस के संबंधों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यूक्रेन युद्ध के दौरान मॉस्को को सैनिकों और हथियारों की आपूर्ति के आरोपों के बीच दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी और मजबूत हुई है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सैन्य सहयोग उत्तर कोरिया की आर्थिक चुनौतियों का समाधान नहीं कर सकता। यही कारण है कि किम जोंग उन एक बार फिर चीन के साथ आर्थिक रिश्तों को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।

विश्लेषकों के अनुसार उत्तर कोरिया यह दिखाना चाहता है कि वह किसी एक शक्ति पर निर्भर नहीं है। रूस से उसे सैन्य तकनीक और रणनीतिक सहयोग मिल सकता है, जबकि आर्थिक सहायता और निवेश के लिए चीन उसकी सबसे बड़ी जीवनरेखा बना हुआ है।

माना जा रहा है कि बैठक में कई महत्वपूर्ण आर्थिक मुद्दों पर चर्चा होगी। इनमें चीनी पर्यटकों के लिए उत्तर कोरिया को दोबारा खोलना, यालू नदी पर बने लंबे समय से निष्क्रिय पड़े पुल का उपयोग शुरू करना तथा चीन-उत्तर कोरिया-रूस सीमा क्षेत्र में संयुक्त आर्थिक विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाना शामिल हो सकता है।

इस मुलाकात का एक महत्वपूर्ण पहलू अमेरिका भी है। वर्ष 2018 और 2019 में किम जोंग उन और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई ऐतिहासिक वार्ताओं के बाद परमाणु निरस्त्रीकरण और प्रतिबंधों को लेकर मतभेद उभर आए थे, जिसके चलते बातचीत की प्रक्रिया ठप हो गई थी। हालांकि अमेरिका ने भविष्य में संवाद की इच्छा जताई है, लेकिन प्योंगयांग अब तक कोई सकारात्मक संकेत नहीं दे रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के साथ मजबूत संबंध उत्तर कोरिया को अमेरिका के साथ संभावित वार्ताओं में बेहतर सौदेबाजी की स्थिति प्रदान कर सकते हैं। वहीं चीन भी नहीं चाहता कि उसका पारंपरिक सहयोगी पूरी तरह रूस के प्रभाव क्षेत्र में चला जाए। इसी कारण शी चिनफिंग का यह दौरा बीजिंग के क्षेत्रीय प्रभाव को मजबूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

महामारी के बाद विदेश यात्राओं को लेकर बेहद सतर्क रुख अपनाने वाले शी चिनफिंग के लिए यह वर्ष 2026 की पहली विदेश यात्रा होगी। हाल ही में उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप और व्लादिमीर पुतिन दोनों की मेजबानी की थी, जबकि अब उनका प्योंगयांग जाना संकेत देता है कि चीन कोरियाई प्रायद्वीप में अपनी रणनीतिक भूमिका को और मजबूत करना चाहता है।

विश्लेषकों की नजर इस बात पर भी टिकी है कि यात्रा के बाद जारी होने वाले संयुक्त बयान में परमाणु निरस्त्रीकरण का उल्लेख होता है या नहीं। अप्रैल में चीन के विदेश मंत्री वांग यी की प्योंगयांग यात्रा के दौरान जारी बयान में इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया था। यदि इस बार भी ऐसा होता है, तो इसे इस संकेत के रूप में देखा जा सकता है कि चीन व्यवहारिक तौर पर उत्तर कोरिया की परमाणु शक्ति की स्थिति को स्वीकार करने की दिशा में बढ़ रहा है।

कुल मिलाकर, शी चिनफिंग और किम जोंग उन की यह मुलाकात केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर पूर्वी एशिया की सुरक्षा व्यवस्था, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकता है। यही वजह है कि इस दौरे पर पूरी दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।

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