समाचार-गढ़ 19 सितंबर, 2026।
नई दिल्ली: विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक यानी FCRA Amendment Bill 2026 को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच तकरार जारी है। विपक्ष और कुछ धार्मिक संगठनों का आरोप है कि प्रस्तावित संशोधन से अल्पसंख्यक समुदायों, खासकर ईसाई संस्थानों को नुकसान हो सकता है। वहीं, केंद्र सरकार का कहना है कि विधेयक किसी समुदाय को निशाना बनाने के लिए नहीं है, बल्कि विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता बढ़ाने, कानून में मौजूद कमियों को दूर करने और राष्ट्रीय हित व आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को संबोधित करने के लिए लाया गया है।
शुक्रवार, 18 सितंबर को FCRA संशोधन विधेयक की जांच कर रही 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की पहली बैठक हुई। गृह सचिव गोविंद मोहन ने समिति के सामने विधेयक के प्रावधानों और सरकार के पक्ष की जानकारी दी। समिति की अध्यक्षता भाजपा सांसद संजय जायसवाल कर रहे हैं।
सरकार ने क्यों जरूरी बताया FCRA संशोधन?
गृह मंत्रालय के मुताबिक FCRA मूल रूप से विदेशी योगदान के नियमन से जुड़ा कानून है और इसका एक प्रमुख उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेश से आने वाले पैसे का इस्तेमाल भारत के राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा के खिलाफ न हो।
गृह सचिव गोविंद मोहन ने JPC के सामने कहा कि प्रस्तावित बदलाव किसी समुदाय के खिलाफ नहीं हैं। सरकार का तर्क है कि विदेशी फंडिंग के इस्तेमाल में पारदर्शिता बढ़ाने और कानून के क्रियान्वयन से जुड़ी कमियों को दूर करने की जरूरत है।
गृह मंत्रालय ने समिति को यह भी बताया कि पिछले एक दशक में FCRA के तहत पंजीकृत NGO की संख्या करीब आधी हुई है, जबकि विदेश से मिलने वाले योगदान की राशि बढ़ी है। मंत्रालय के अनुसार 2024-25 में विदेशी योगदान करीब ₹22,974 करोड़ रहा।
धार्मिक गतिविधियों पर कितना विदेशी पैसा?
JPC की बैठक में विदेशी फंडिंग के इस्तेमाल से जुड़ा एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा सामने आया। गृह मंत्रालय ने बताया कि FCRA के तहत मिलने वाले कुल विदेशी योगदान में करीब 8 फीसदी राशि धार्मिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होती है। मंत्रालय ने यह आंकड़ा विधेयक के उद्देश्य और विदेशी फंडिंग के व्यापक इस्तेमाल को समझाने के संदर्भ में समिति के सामने रखा।
मंत्रालय का कहना है कि विदेशी फंडिंग का बड़ा हिस्सा सामाजिक गतिविधियों और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में जाता है। धार्मिक संगठनों में ईसाई संस्थाओं की हिस्सेदारी अधिक होने की बात भी बैठक में सामने आई।
विपक्ष का आरोप- अल्पसंख्यक संस्थानों पर पड़ेगा असर
विपक्षी दलों और कुछ धार्मिक संगठनों ने विधेयक के कई प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि प्रस्तावित बदलाव से विदेशी फंड हासिल करने वाले अल्पसंख्यक और खासकर ईसाई संस्थानों के कामकाज पर असर पड़ सकता है।
DMK सांसद पी. विल्सन ने भी इस तरह की चिंताएं समिति के सामने उठाईं। विपक्ष का कहना है कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि प्रस्तावित प्रावधानों का इस्तेमाल वैध रूप से विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठनों के खिलाफ नहीं होगा।
विपक्ष की एक प्रमुख चिंता उस प्रस्तावित व्यवस्था को लेकर भी है, जिसके तहत किसी संगठन का FCRA लाइसेंस खत्म होने या नवीनीकृत नहीं होने की स्थिति में उसकी विदेशी चंदे से बनाई गई संपत्तियों के प्रबंधन और निपटारे के लिए सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकरण की भूमिका होगी।
बीजेपी ने विदेशी फंडिंग के पुराने मामलों का उठाया मुद्दा
JPC की बैठक में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने विदेशी फंडिंग और भारत के राष्ट्रीय हित से जुड़े पुराने मामलों का मुद्दा उठाया। उन्होंने सवाल किया कि विदेशी पैसे के जरिए देश के महत्वपूर्ण मुद्दों को प्रभावित करने की संभावनाओं को कैसे नियंत्रित किया जाए।
दुबे ने विदेशी फंडिंग के इतिहास का जिक्र करते हुए फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर फाउंडेशन से जुड़े पुराने उदाहरण भी उठाए। उनका तर्क था कि विदेशी धन के इस्तेमाल और उसके संभावित प्रभाव को लेकर भारत में लंबे समय से चिंता रही है।
31 सदस्यीय JPC कर रही विधेयक की जांच
FCRA संशोधन विधेयक को अगस्त में दोनों सदनों की मंजूरी के बाद विस्तृत जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा गया था। समिति में लोकसभा के 21 और राज्यसभा के 10 सदस्य हैं। भाजपा सांसद संजय जायसवाल इसके अध्यक्ष हैं।
पहली बैठक में सांसदों ने गृह सचिव से विधेयक के अलग-अलग प्रावधानों को लेकर सवाल किए। कई सदस्यों की ओर से उठाए गए सवालों के जवाब के लिए अगली बैठक 29 सितंबर को प्रस्तावित की गई है, जिसमें गृह मंत्रालय के साथ कानून मंत्रालय के अधिकारियों को भी बुलाया जाएगा।
शीतकालीन सत्र में रिपोर्ट आने की उम्मीद
JPC अध्यक्ष संजय जायसवाल ने कहा है कि समिति सभी सदस्यों के सवालों और सुझावों पर विचार करेगी। समिति को अपनी रिपोर्ट संसद के शीतकालीन सत्र के पहले सप्ताह के अंतिम दिन तक सौंपने का लक्ष्य दिया गया है।
फिलहाल FCRA संशोधन विधेयक पर सरकार का तर्क राष्ट्रीय हित, आंतरिक सुरक्षा, पारदर्शिता और विदेशी फंडिंग के बेहतर नियमन पर केंद्रित है, जबकि विपक्ष की मुख्य चिंता सरकारी निगरानी के बढ़ते दायरे और अल्पसंख्यक संस्थानों पर संभावित प्रभाव को लेकर है। अब JPC की आगे की बैठकों में इन दोनों पक्षों से जुड़े प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा होगी।








