समाचार-गढ़ 5 अक्टूबर, 2026।
एक रील खत्म होती है… उंगली ऊपर जाती है… और अगली रील शुरू। फिर अगली, फिर अगली और देखते-देखते पता ही नहीं चलता कि कितना समय स्क्रीन पर निकल गया। भारत में ऑनलाइन वीडियो देखने की आदत अब सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है। यह एक बड़ा डिजिटल इकोसिस्टम और कारोबार बन चुकी है।
एक वीडियो खत्म होने के तुरंत बाद दूसरा वीडियो सामने आना इस आदत को और बढ़ाता है। करोड़ों लोगों का यही स्क्रीन टाइम सोशल मीडिया और डिजिटल वीडियो प्लेटफॉर्म के लिए विज्ञापन और कमाई का बड़ा आधार बन रहा है।
भारत में 66 करोड़ से ज्यादा ऑनलाइन वीडियो दर्शक
ओरमैक्स की ‘OTT ऑडियंस रिपोर्ट 2026’ के मुताबिक, भारत में ऑनलाइन वीडियो देखने वालों की संख्या 66.49 करोड़ है। यह देश की आबादी का करीब 45 प्रतिशत है।
जून-जुलाई 2026 में देशभर के 15,000 लोगों पर किए गए सर्वे में ऐसे व्यक्ति को OTT दर्शक माना गया, जिसने पिछले महीने कम से कम एक ऑनलाइन वीडियो देखा हो।
रिपोर्ट के अनुसार, एक औसत भारतीय दर्शक हर सप्ताह 14.9 घंटे वीडियो देखता है। इसमें सिर्फ रील्स या शॉर्ट वीडियो ही नहीं, बल्कि सोशल मीडिया, माइक्रो-ड्रामा और फास्ट चैनल समेत अलग-अलग तरह के ऑनलाइन वीडियो शामिल हैं।
साल में करीब 517 अरब घंटे वीडियो देखा गया
इसी औसत के आधार पर भारत में सालाना करीब 517 अरब घंटे वीडियो देखने का अनुमान लगाया गया है। 365 दिनों के हिसाब से यह रोजाना करीब 141 करोड़ घंटे बैठता है।
ध्यान रखना जरूरी है कि 141 करोड़ घंटे का रोजाना आंकड़ा ओरमैक्स का सीधा आंकड़ा नहीं है, बल्कि रिपोर्ट के सालाना अनुमान से की गई गणना है। इसमें केवल रील्स नहीं, बल्कि OTT, YouTube और अन्य ऑनलाइन वीडियो भी शामिल हैं।
141 करोड़ घंटे की संभावित कीमत कितनी?
अगर 141 करोड़ घंटे को 8 घंटे के कार्यदिवस में बदला जाए तो यह रोजाना करीब 17.6 करोड़ कार्यदिवस के बराबर बैठता है।
समय की संभावित आर्थिक कीमत का मोटा अनुमान लगाने के लिए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2025 में बताए गए कैजुअल श्रमिकों की औसत कमाई को आधार बनाया गया है। इसके अनुसार 30 दिनों में औसत कमाई ₹11,550 यानी करीब ₹385 प्रतिदिन थी।
इस आधार पर इन घंटों की संभावित कीमत करीब 6,776 करोड़ रुपये रोजाना और लगभग 24.7 लाख करोड़ रुपये सालाना बैठती है।
हालांकि, इसे वास्तविक आर्थिक नुकसान नहीं माना जा सकता। यह सिर्फ समय के संभावित मूल्य का एक मोटा अनुमान है, क्योंकि स्क्रीन पर बिताया गया हर घंटा कामकाजी घंटा नहीं होता।
क्या शॉर्ट वीडियो ध्यान को प्रभावित करते हैं?
शॉर्ट वीडियो और ज्यादा स्क्रीन टाइम को लेकर रिसर्च भी हुई है। जून 2026 में European Child & Adolescent Psychiatry में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा में 42 अध्ययनों को शामिल किया गया। ये सभी अवलोकन आधारित अध्ययन थे और समीक्षा में इनके प्रमाणों को कम भरोसे वाला माना गया।
समीक्षा में यह भी सामने आया कि अलग-अलग अध्ययनों में 15 तरह के एडिक्शन स्केल इस्तेमाल किए गए, जिससे नतीजों की सटीकता प्रभावित हो सकती है।
एक अन्य मेटा-विश्लेषण में 71 अध्ययनों और 98,299 प्रतिभागियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें शॉर्ट वीडियो के ज्यादा इस्तेमाल और कमजोर संज्ञानात्मक क्षमता के बीच संबंध पाया गया, खासकर ध्यान और आवेग-नियंत्रण के मामले में।
लेकिन यहां भी एक जरूरी सावधानी है। करीब 87 प्रतिशत अध्ययन सहसंबंध वाले थे। यानी संबंध दिखाई देता है, लेकिन इससे यह निश्चित रूप से साबित नहीं होता कि शॉर्ट वीडियो ही ध्यान कम कर रहे हैं या पहले से कम ध्यान वाले लोग ज्यादा शॉर्ट वीडियो देखते हैं।
टीवी स्क्रीन की पहुंच भी बढ़ी
डिजिटल वीडियो का असर सिर्फ मोबाइल स्क्रीन तक सीमित नहीं है। ओरमैक्स के अनुसार भारत में कनेक्टेड टीवी दर्शकों की संख्या 60 प्रतिशत बढ़कर 20.69 करोड़ हो गई है। पिछले साल यह संख्या 12.92 करोड़ थी।
वहीं, सक्रिय पेड OTT सब्सक्रिप्शन 14.8 करोड़ से बढ़कर करीब 17.26 करोड़ हो गए हैं। यानी इनमें करीब 16 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
यहां यह समझना जरूरी है कि ये सब्सक्रिप्शन की संख्या है, अलग-अलग लोगों की संख्या नहीं।
दर्शकों का ध्यान बना विज्ञापन बाजार की ताकत
करोड़ों दर्शकों का स्क्रीन टाइम डिजिटल विज्ञापन बाजार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। अमेरिकी Interactive Advertising Bureau यानी IAB और PwC की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 में सोशल मीडिया विज्ञापन से 117.7 अरब डॉलर का राजस्व आया, जो एक साल में 32.6 प्रतिशत बढ़ा।
इसी रिपोर्ट के अनुसार डिजिटल वीडियो विज्ञापन राजस्व भी 25.4 प्रतिशत बढ़कर 78 अरब डॉलर पहुंच गया।
हालांकि ये आंकड़े अमेरिकी बाजार के हैं, वैश्विक बाजार के नहीं। IAB के मुताबिक सोशल विज्ञापन कुल डिजिटल विज्ञापन राजस्व का करीब 40 प्रतिशत है।
Meta की कमाई में भी विज्ञापन का बड़ा योगदान
Meta की 2025 की 10-K फाइलिंग के मुताबिक, कंपनी का विज्ञापन राजस्व करीब 196.2 अरब डॉलर रहा। इसमें सालाना करीब 22 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।
कंपनी के अनुसार इस वृद्धि में विज्ञापन इंप्रेशन में करीब 12 प्रतिशत और प्रति विज्ञापन औसत कीमत में करीब 9 प्रतिशत की बढ़ोतरी का योगदान रहा।
यानी कहानी सिर्फ इतनी नहीं है कि लोग घंटों मोबाइल पर स्क्रॉल कर रहे हैं। असली सवाल यह है कि आपका ध्यान जितनी देर स्क्रीन पर टिकता है, उसके पीछे उतना ही बड़ा डिजिटल विज्ञापन कारोबार खड़ा होता जाता है।








