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श्राद्ध पक्ष मे करें मात्र ये 1 उपाय पितृदेव बरसायेंगे कृपा अपार, जानते हैं आचार्य राजगुरु पंडित रामदेव उपाध्याय के साथ

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समाचार गढ़, श्रीडूंगरगढ़। श्रीडूंगरगढ़ क्षेत्र के आचार्य राजगुरु पंडित रामदेव उपाध्याय ने बताया कि हमारे हिंदू समाज में न सिर्फ देवी -देवता बल्कि हमारे पितृजन भी पूजनीय होते है। कहा जाता है कि जब ब्रह्मा जी ने स्वर्ग लोक और पाताल लोक की रचना की थी। तब उन्होंने पितरों के लिए पितृलोक भी बनाया था। जहां हम सभी के पितृजन मृत्यु के पश्चात वास करते हैं। पितृ पक्ष के इस महीने में पितृजन पितृलोक से धरती पर अपने परिजनों से मिलने आते हैं। इसके साथ ही वह अपने प्रियजनों के हाथ का ही भोजन ग्रहण करते हैं। जो उन्हें तृप्ति प्रदान करता है। जिससे वह प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद देकर पुनः पितृलोक लौट जाते हैं। किंतु अगर धरती पर यदि उन्हें तृप्ति प्राप्त न हो अर्थात् यदि उनके प्रियजनों द्वारा उनका पोषण न किया जाए तो पितृ रुष्ट होकर पुनः पितृलोक लौट जाते हैं। जिससे उस परिवार पर पितृ दोष लग जाता है। हिंदू धर्म में तीन प्रकार के ऋण को सबसे महत्वपूर्ण बताया गया है। जो हैं – देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। जिसमें पितृ ऋण का महत्त्व सबसे अधिक है। पितृपक्ष पितरों का उद्धार करने के लिए मनाया जाने वाला त्यौहार है। जो आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि से लेकर अमावस्या तिथि तक मनाया जाता है।

Pitru Paksha
पितृपक्ष में श्राद्ध क्यों किए जाते हैं। जाने इसका महत्व
16 दिनों तक चलने वाला पितृ पक्ष पूर्वजों की आत्माओं की शांति का त्यौहार है। इस समय पितृ ऋण से मुक्ति पाने के लिए श्राद्ध किए जाते हैं। पितृपक्ष में श्राद्ध पितरों को मुक्ति दिलाने के लिए किया जाता है। हमारे धर्म ग्रंथों में बताया गया है कि 16 संस्कारों में “अंतिम संस्कार” सबसे अंतिम संस्कार है। ऐसा माना गया है कि मनुष्य जैसे कर्म धरती पर करता है। उसे वैसा ही लोक प्राप्त होता है। जैसे जो व्यक्ति धर्म-कर्म, अच्छे काम करता है। उसे स्वर्ग मिलता है। लेकिन जो व्यक्ति बुरे काम करता है। उन्हें नर्क प्राप्त होता है। सनातन धर्म के अनुसार जब व्यक्ति का अंतिम संस्कार किया जाता है उसके पश्चात् त्रिमासिक,अर्धवार्षिक, वार्षिक आदि घट दान कर्मों के पश्चात् उसे पितरों से मिलाया जाता है। उसके बाद वह पितृ रूप में रहता है। उसे उस लोक में तब तक रहना पड़ता है। जब तक उसे गति नहीं मिलती। यह भी माना जाता है कि सभी पितृ अपने पुत्रों के पास आते हैं। ताकि उन्हें तर्पण मिले। जो उन्हें संतुष्ट कर देता है। उसे पितृ आशीर्वाद देते हैं। जबकि जिससे उन्हें कुछ नहीं मिलता। वह क्रोधित और दुखी होकर, उन्हें श्राप भी देते हैं।

अगर हमारे पूर्वज न होते तो आज हम भी न होते। हर किसी को अपने पूर्वजों से चाहे वह आपके पिता या दादा हो। उनसे कुछ न कुछ संपत्ति जरूर मिलती है। जिसे हम पुश्तैनी संपत्ति कहते हैं। ऐसे में, अपने पूर्वजों को पितृपक्ष में, समय-समय पर धन्यवाद जरूर देना चाहिए। यह धन्यवाद देने का मौका आपको पितृपक्ष में मिलता है। जिन लोगों को मेहनत करने के बाद भी भाग्य का साथ नहीं मिलता हैं और उसका फल नहीं मिल पाता है पूरे जीवन में कष्ट ही कष्ट भरा रहता है। तो यह पितृ दोष का कारण भी हो सकता है। चाहे आपको अपने पितरों को धन्यवाद देना हो या पितृदोष से छुटकारा पाना चाहते हैं तो पितृपक्ष आपके लिए एक अच्छा समय है। पितृपक्ष हर वर्ष आता है। सन् 2022 में पितृपक्ष का आरंभ भाद्रपद मास की पूर्णिमा तिथि से शुरू होगा। जो कि 10 सितंबर 2022 को है। पितृपक्ष की समाप्ति रविवार 26 सितंबर 2022 को होगी।

पितृपक्ष 2022 की महत्वपूर्ण तिथियाँ –

10 सितम्बर 2022
शनिवार
पूर्णिमा व प्रतिपदा श्राद्ध

11 सितम्बर 2022
रविवार
द्वितीया श्राद्ध

12 सितम्बर 2022
सोमवार
तृतीया श्राद्ध

13 सितम्बर 2022
मंगलवार
चतुर्थी श्राद्ध

14 सितम्बर 2022
बुद्धवार
पंचमी श्राद्ध

15 सितम्बर 2022
गुरुवार
षष्ठी श्राद्ध

16 सितम्बर 2022
शुक्रवार
सप्तमी श्राद्ध

17 सितम्बर 2022

शनिवार


18 सितम्बर 2022
रविवार
अष्टमी श्राद्ध

19 सितम्बर 2022
सोमवार
नवमी श्राद्ध

20 सितम्बर 2022
मंगलवार
दशमी श्राद्ध

21 सितम्बर 2022
बुद्धवार
एकादशी श्राद्ध

22 सितम्बर 2022
गुरुवार
द्वादशी श्राद्ध एवं संन्यासी श्राद्ध

23 सितम्बर 2022 शुक्रवार
त्रयोदशी श्राद्ध

24 सितम्बर 2022
शनिवार
चतुर्दशी श्राद्ध

25 सितम्बर 2022
रविवार
अमावस्याश्राद्ध

26 सितंबर 2022
सोमवार
मातामह श्राद्ध

Pitru Paksha
पितृ पक्ष की मान्यता व पौराणिक कथा-
पितृपक्ष की महिमा को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं। जिनका पाठ तर्पण करते समय किया जाना चाहिए। इसमें सबसे ज्यादा कर्ण की कथा कही जाती है। जो महाभारत काल से सुनी जा रही है। उनकी इस कथा का वर्णन इस प्रकार मिलता है

कथा- महाभारत के युद्ध में वीरगति को प्राप्त होने के बाद जब कर्ण की आत्मा स्वर्ग में पहुंची तो उन्हें भोजन में सोना-चांदी, हीरे, जवाहरात परोसे गए। इस पर कर्ण ने इंद्र देव से इसका कारण पूछा। तब इंद्रदेव ने उन्हें बताया कि तुमने अपने जीवन काल में सोना-चांदी, हीरे-जवाहरात आदि दान किए हैं। लेकिन तुमने कभी भोजन का दान नहीं दिया। तुम्हारे पुत्र भी महाभारत के युद्ध में मारे जा चुके हैं। इसलिए तुम्हारे निमित्त किसी ने भी तर्पण और भोजन आदि दान नहीं दिया। तब कर्ण ने इंद्र को बताया उन्हें अपने पूर्वजों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। इस वजह से वह कभी कुछ दान ही नहीं कर पाए। यह जानकर इंद्र ने कर्ण को उनकी गलती सुधारने का मौका दिया। फिर 16 दिन के लिए उन्हें पृथ्वी पर वापस भेजा। जब कर्ण 16 दिन के लिए पृथ्वी पर वापस आए तब उन्होंने अपने पूर्वजों को याद करते हुए विधि-विधान से उनका तर्पण किया एवं साथ ही ब्राह्मणों को भोजन करवाकर दान-दक्षिणा देकर उन्हें विदा किया। इन्हीं 16 दिनों की अवधि को पितृपक्ष कहा जाता है। तभी से यह श्राद्ध प्रक्रिया प्रारंभ हुई।

गयाजी का महत्व व कथा-
वायु पुराण के अनुसार आर्यवर्त के पूर्वी क्षेत्र में कोलाहल नाम के पर्वत पर गया नामक असुर ने हजारों वर्ष तक घोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रभावित होकर, भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को उसे वरदान देने के लिए कहा। ब्रह्मा जी सभी देवताओं के साथ गयासुर के पास पहुंचे। उन्होंने गयासुर से वरदान मांगने को कहा तब गयासुर ने वर मांगा कि समस्त देवताओं, ऋषियों और मुनियों का सभी पूण्य उसे प्राप्त हो जाए। उसका शरीर देवताओं की तरह पवित्र हो जाए। लोग उसके दर्शन मात्र से ही पाप मुक्त हो जाएं। इस पर ब्रह्मा जी सहित सभी देवताओं ने तथास्तु कह दिया। देवताओं के वरदान का यह परिणाम हुआ। जो भी उसके दर्शन करता। वह पाप मुक्त होकर पवित्र हो जाता था। गयासुर के पास आने वाला हर जीव स्वर्ग को जाने लगा। विधि के विधान को समाप्त होता हुआ देखकर ब्रह्मा जी गयासुर के पास गए। उन्होंने कहा हे परम पुण्य गयासुर मुझे ब्रह्म यज्ञ करना है। तुम्हारे समान पुण्य भूमि मुझे कहीं और नहीं मिलेगी। इसलिए तुम अपने इस शरीर को मुझे प्रदान करो। गयासुर ने यज्ञ के लिए ब्रह्मा जी को अपना शरीर दे दिया। जब यज्ञ प्रारंभ हुआ तो उसका शरीर हिलने लगा। ब्रह्मा जी ने नाभि प्राण से उसे संतुलित किया। विष्णु जी ने गयासुर की छाती पर अपने चरण रखकर अपनी गदा से गयासुर के कंपन को संतुलित किया। श्री हरि विष्णु जी की चरण छाप पड़ने पर गयासुर का अंहकार नष्ट हो गया। उसने मरते समय विष्णु जी से वरदान मांगा कि इस यज्ञ क्षेत्र में विष्णु पाद पर, जिसका भी श्राद्ध हो उसे सद्गति मिले। भगवान विष्णु ने गयासुर की इस मंगल कामना का आदर किया। फिर उसे भी सद्गति दी। साथ ही वरदान भी प्रदान किया तभी से उस संपूर्ण तीर्थ क्षेत्र का नाम गयाजी पड़ गया। ब्रह्मा जी ने उस भूमि को श्राद्ध कर्म की भूमि घोषित कर दिया। वहां तर्पण करने से पितरों की तृप्ति होती है। वायु पुराण में तो यह भी कहा गया है। गया की ओर मुख करके तर्पण करने से पितरों को मुक्ति मिल जाती है। जो भी गया में अपने पितरों का पिंडदान करता है। उसके पितृ तृप्त हो जाते हैं। गया में श्राद्ध कर्म करने से पितरों को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध और तर्पण करना अत्यंत आवश्यक माना जाता है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा नहीं करता। तो उसे अपने पितरों का श्राप लगता है। लेकिन शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म के बाद जितना जरूरी ब्राह्मण और भांजे को भोजन करवाना होता है। उतना ही जरूरी कौंवे को भोजन करवाना भी होता है।

श्राद्ध कर्म में कौवे का महत्व-

ऐसा माना जाता है कि कौए इस समय हमारे पितरों का रूप धारण करके पृथ्वी पर उपस्थित रहते हैं। इसके पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। देवराज इंद्र के पुत्र जयंत ने ही सबसे पहले कौए का रूप धारण किया था। यह कथा त्रेतायुग की है। जब भगवान श्रीराम ने अवतार लिया तब जयंत ने कौवे का रूप धारण करके माता सीता के पैर में चोंच मारी थी। तब भगवान श्रीराम ने तिनके का बाण चलाकर जयंत की आंख फोड़ दी थी। तब जयंत ने अपने किए की माफी मांगी। उस समय भगवान श्रीराम ने उसे यह वरदान दिया कि तुम्हें अर्पित किया गया भोजन पितरों को मिलेगा। तभी से श्राद्ध में कौए को भोजन करवाने की परंपरा चली आ रही है। यही कारण है कि श्राद्ध पक्ष में कौए को भोजन पहले करवाया जाता है। पितृपक्ष में न तो कौए को मारा जाता है। न ही उन्हें कहीं से भगाया जाता है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करते हैं। तो उन्हें पितरों के श्राप के साथ-साथ, अन्य देवी-देवताओं के क्रोध का भी सामना करना पड़ता है। उन्हें जीवन में कभी भी किसी प्रकार की सुख और शांति की प्राप्ति नहीं होती।

श्राद्ध का अर्थ है कि अपने मित्र, परिजनों को याद करना। उन्हें तृप्त करने का प्रयास करना। यह जानना बेहद जरूरी है कि श्राद्ध किस प्रकार करना चाहिए। क्योंकि पिता-माता, विष्णु ऋषियों आदि का श्राद्ध करने का दिन अलग-अलग होता है। जैसे पिता का श्राद्ध अष्टमी के दिन किया जाता है। माता का श्राद्ध नवमी के दिन किया जाता है। अगर घर में किसी की अकाल मृत्यु हुई हो। जैसेकि दुर्घटना में मौत हुई हो। तो उनका श्राद्ध शरद चतुर्दशी के दिन किया जाता है। महान आत्माओं या ऋषि-मुनियों का श्राद्ध द्वादशी के दिन किया जाता है। अगर आपको किसी परिजन की मृत्यु की तिथि याद नहीं है। या वह आपके परिवार का कोई अन्य सदस्य हो। या फिर वह आपका रिश्तेदार नहीं, बल्कि जानने वाला हो। तो उसका श्राद्ध अमावस्या के दिन किया जाता है।

श्राद्ध के दिनों मे क्या करें और क्या ना करें-
ऐसा कहा जाता है कि हमारे पितृ अपने श्राद्ध वाले दिन हमारे दरवाजे पर किसी भी रूप में आ सकते हैं। इसलिए अगर इन दिनों आपके घर कोई भी जीव या मनुष्य आता है तो उसे ऐसे ही न जाने दें उसे भोजन और जल दे। इन दिनों पशु-पक्षियों को भी खाने को दें। इन दिनों कुछ चीजों का सेवन करना निषेध माना गया है। जैसे मसूर की दाल, प्याज, लहसुन, मूली,मांस-मछली और शराब का सेवन नहीं करना चाहिए। इन दिनों ब्राह्मण को भोजन कराने का भी विशेष महत्व है। इसके साथ ही उन्हें दक्षिणा भी देनी चाहिए। इसके साथ ही आप जरूरतमंदों को भी भोजन कराएं। इन दिनों क्रोध, काम, लोभ, तृष्णा, लालच आदि के विचार। अपने मन में न आने दे। घर में जो भी आये उसका सत्कार करें। उन्हें प्यार से भोजन कराएं। धर्मग्रंथों के अनुसार, पितृपक्ष के समय प्रयाग,गया या बद्रीनाथ में श्राद्ध या पिण्डदान किया जाए। तो पितरों को मुक्ति मिलती है। किंतु अगर वहां जा पाए। तो आप अपने घर पर भी इसे कर सकते हैं।

आइए अब जानते हैं कि कौन सा एकमात्र अचूक उपाय करके हम शीघ्र पितरों की कृपा प्राप्त कर सकते हैं?
वैसे तो पितृ शांति अनुष्ठान एक विशाल अनुष्ठान होता है जिसको सम्पन्न करने में न केवल यजमान को अधिक अर्थ बल्कि अर्थ के साथ-साथ अपने पित्तरो के निमित्त महत्वपूर्ण एवं दीर्घकालीन समय भी देना आवश्यक होता है किंतु समय के अभाव एवं आर्थिक स्थिति को देखते हुए एक संक्षिप्त निवारण का वर्णन करने जा रहा हूं। जिससे यजमान को पितृ दोष से कुछ राहत मिल सके।

निवारण- श्राद्ध पक्ष में एक कटोरी में थोड़ा-सा कच्चा चावल रखकर उस पर एक बिल्वपत्र थोड़ी सी दुर्वा बांधकर पानी का मटका या घर के जल स्थान एनी परिंडा आदि में उस कटोरी को 3 दिन रख देंगे और यदि संभव हो तो 16 दिन रखें तो अति उत्तम रहेगा एवं वहीं पर घी का दीपक भी जलाएं 3 या 16 दिन के बाद में उस दूर्वा एवं बिल्वपत्र को भगवान शिव को अर्पण कर दें एवं चावल को पूरे घर में घुमा कर के चिड़िया को या अन्य किसी जीव को खाने के लिए दे देवें या नदी में भी विसर्जित कर सकते हैं यह पितृ दोष का एक संक्षिप्त निवारण है।

राजगुरु पंडित रामदेव उपाध्याय
(शास्त्री-आचार्य , ज्योतिष विद्)
भूतपूर्व सहायक आचार्य
श्री ऋषिकुल संस्कृत विद्यालय
श्री डूंगरगढ़
9829660721

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