समाचार गढ़ 30 मई 2026। सुप्रीम कार्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी व्यक्ति को अदालत के रिहाई आदेश के बावजूद जेल में रखना उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट ने राजस्थान के दाऊदयाल मामले में राज्य सरकार को 11 लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश दिया।
जस्टिस संजय करोल और अगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 29 मई को फैसला सुनाते हुए कहा कि केवल दोषसिद्ध व्यक्ति होने से किसी के संवैधानिक अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। प्रशासनिक देरी या सरकारी प्रक्रियाएं किसी नागरिक की स्वतंत्रता छीनने का आधार नहीं बन सकतीं।
क्या है मामला?
दाऊदयाल को वर्ष 1988 के गैर-इरादतन हत्या के मामले में चार वर्ष के कठोर कारावास की सजा हुई थी। गिरफ्तारी के बाद उन्होंने स्थायी पैरोल के लिए आवेदन किया, जिसे जनवरी 2024 में खारिज कर दिया गया। इसके खिलाफ याचिका पर हाईकोर्ट ने 5 नवंबर 2024 को उन्हें निजी मुचलके और जमानतदार प्रस्तुत करने की शर्त पर रिहा करने का आदेश दिया।
सभी आवश्यक दस्तावेजों और जमानतदारों का सत्यापन 13 नवंबर 2024 तक पूरा हो गया था, लेकिन इसके बावजूद उन्हें रिहा नहीं किया गया। अंततः हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के हस्तक्षेप के बाद 6 दिसंबर 2024 को रिहाई हुई। इस प्रकार वे रिहाई आदेश के बाद भी 24 दिन तक जेल में बंद रहे।
सरकार का तर्क खारिज
राज्य सरकार ने दलील दी कि वह आदेश को चुनौती देने पर विचार कर रही थी, इसलिए रिहाई में देरी हुई। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि जब तक किसी उच्च अदालत से आदेश पर स्थगन (स्टे) नहीं मिलता, तब तक अदालत के आदेश का पालन करना अनिवार्य है।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
पीठ ने कहा कि बिना कानूनी अधिकार या संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन में किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनना अवैध हिरासत (Illegal Detention) है। राज्य अपनी धीमी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण किसी व्यक्ति की आजादी को सीमित नहीं कर सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि एक बार किसी कैदी की रिहाई का आदेश पारित हो जाए तो उसका तत्काल पालन किया जाना चाहिए। आदेश का पालन न करना और व्यक्ति को जेल में बनाए रखना संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने दाऊदयाल को 24 दिन की अवैध हिरासत के लिए 11 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया।













