समाचार-गढ़ 3 सितंबर, 2026।
नई दिल्ली: भारत और रूस के रिश्तों में ऊर्जा, रक्षा और कारोबार के बाद अब आर्कटिक क्षेत्र भी सहयोग का बड़ा केंद्र बनता नजर आ रहा है। BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की द्विपक्षीय बातचीत में आर्कटिक और नॉर्दर्न सी रूट (NSR) अहम मुद्दों में शामिल रह सकता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देश आर्कटिक क्षेत्र में व्यापार, तकनीक, वैज्ञानिक सहयोग और समुद्री परिवहन से जुड़े कई पहलुओं पर आगे बढ़ने की संभावनाएं तलाश रहे हैं। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने भी हाल में भारत-रूस के बीच आर्कटिक सहयोग की संभावनाओं का जिक्र किया है।
आर्कटिक को लेकर भारत-रूस के बीच क्या बातचीत हो रही है?
रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के एक लेख के मुताबिक, भारत और रूस हाई-लैटिट्यूड क्षेत्रों को लेकर सक्रिय बातचीत कर रहे हैं। अगस्त में दोनों देशों के बीच व्यापारिक, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग से जुड़े अंतरसरकारी आयोग में भी आर्कटिक क्षेत्र पर चर्चा हुई।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में आर्कटिक भारत और रूस के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन सकता है। इसी बीच रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने हाल में आर्कटिक क्षेत्र के लिए जहाज बनाने वाले एक शिपयार्ड का दौरा भी किया था। उनके संबोधन में भारत और रूस के बीच आर्कटिक साझेदारी की संभावनाओं का संकेत भी मिला।
भारत के लिए Northern Sea Route क्यों महत्वपूर्ण?
भारत के लिए आर्कटिक सहयोग का सबसे बड़ा आकर्षण नॉर्दर्न सी रूट हो सकता है। यह समुद्री मार्ग रूस के आर्कटिक तट के साथ होकर एशिया को यूरोप से जोड़ता है।
इस रूट का इस्तेमाल बढ़ने पर भारतीय जहाजों को यूरोप पहुंचने के लिए पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग की तुलना में दूरी और यात्रा समय दोनों में बड़ी बचत हो सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, NSR से यूरोप तक की समुद्री दूरी करीब 40% तक कम हो सकती है और यात्रा में लगभग दो हफ्ते तक की बचत संभव है।
भारत और रूस के बीच ऐसे जहाजों के निर्माण और भारतीय कार्गो के लिए जरूरी पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने को लेकर भी बातचीत चल रही है।
क्या है Northern Sea Route?
नॉर्दर्न सी रूट करीब 5,600 किलोमीटर लंबा समुद्री मार्ग है, जो रूस के बर्फीले आर्कटिक क्षेत्र से होकर गुजरता है।
साल के बड़े हिस्से में यहां समुद्री बर्फ की चुनौती रहती है। हालांकि, जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री बर्फ के पैटर्न में बदलाव आया है और कुछ अवधि में इस रूट पर आवाजाही की संभावनाएं बढ़ी हैं। इसके बावजूद यहां सामान्य जहाजों के बजाय बर्फीले समुद्री क्षेत्र में संचालन के लिए सक्षम विशेष जहाजों की जरूरत होती है।
रूस की परमाणु ऊर्जा कंपनी Rosatom NSR के विकास में प्रमुख भूमिका निभा रही है। आर्कटिक समुद्री परिवहन के लिए जरूरी जहाजों और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर में भारत-रूस सहयोग आगे बढ़ने की संभावना है।
आर्कटिक में छिपा है संसाधनों का बड़ा भंडार
रूस का आर्कटिक क्षेत्र सिर्फ समुद्री रास्ते के लिहाज से ही अहम नहीं है, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के कारण भी रणनीतिक महत्व रखता है। यहां बड़ी मात्रा में:
- LNG और अन्य हाइड्रोकार्बन
- निकेल
- तांबा
- प्लेटिनम
- पैलेडियम
- रेअर अर्थ एलिमेंट्स
जैसे महत्वपूर्ण संसाधन मौजूद हैं।
ऐसे में आर्कटिक में भारत-रूस सहयोग से भारत को भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति और यूरोप के साथ वैकल्पिक समुद्री व्यापार मार्ग के लिहाज से फायदा मिल सकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह साझेदारी?
अगर भारत और रूस NSR से जुड़े जहाज निर्माण, पोर्ट सुविधाओं और कार्गो ट्रांसपोर्ट पर ठोस समझौते की दिशा में आगे बढ़ते हैं, तो इसका असर दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों से आगे भी दिखाई दे सकता है। यूरोप तक कम दूरी, कम यात्रा समय और आर्कटिक के रणनीतिक संसाधनों तक पहुंच भारत के लिए इस साझेदारी को खास बना सकती है।









