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स्वेज नहर का विकल्प तैयार कर रहा भारत! आर्कटिक के रास्ते यूरोप पहुंचेंगे जहाज, चीन-रूस भी दौड़ में

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समाचार-गढ़ 22 अगस्त, 2026।

एशिया से उत्तरी यूरोप तक समुद्री व्यापार के लिए भारत अब एक ऐसे रास्ते पर नजरें गड़ा रहा है, जो पारंपरिक स्वेज नहर मार्ग की तुलना में यात्रा का समय काफी कम कर सकता है। भारत रूस के नॉर्दर्न सी रूट (NSR) के जरिए यूरोप तक माल पहुंचाने की तैयारी कर रहा है।

जलवायु परिवर्तन और लाल सागर में जारी सुरक्षा संकट के बीच इस वैकल्पिक समुद्री कॉरिडोर की अहमियत तेजी से बढ़ी है। रूस के आर्कटिक क्षेत्र से होकर गुजरने वाला यह मार्ग एशिया को उत्तरी यूरोप से जोड़ता है। भारत के साथ-साथ चीन और दक्षिण कोरिया भी इस रूट में अपनी दिलचस्पी बढ़ा रहे हैं।

2027 में पहला भारतीय पायलट जहाज भेजने की तैयारी

भारत अगले साल यानी 2027 में नॉर्दर्न सी रूट से अपना पहला पायलट कार्गो जहाज भेजने की योजना बना रहा है।

रूस के आर्कान्गेल्स्क में 13 अगस्त को आयोजित आर्कटिक-क्षेत्रीय मंच में भारत के जहाजरानी मंत्रालय के संयुक्त सचिव एस. वेंकटेशपथी ने कहा कि भारत इस रूट से पहला पायलट पोत चलाने की योजना बना रहा है और उसे इसमें काफी संभावनाएं दिखाई देती हैं।

इसका मतलब यह है कि भारत फिलहाल इस मार्ग को बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करने से पहले इसकी व्यावहारिकता, सुरक्षा, मौसम और लॉजिस्टिक्स को समझने के लिए पायलट यात्रा की तैयारी कर रहा है।

आखिर नॉर्दर्न सी रूट इतना महत्वपूर्ण क्यों हो गया?

रूस का नॉर्दर्न सी रूट आर्कटिक महासागर के साथ रूस के उत्तरी तट से होकर गुजरता है। यह एशिया और उत्तरी यूरोप के बीच समुद्री दूरी को स्वेज नहर वाले पारंपरिक मार्ग की तुलना में काफी कम कर सकता है।

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, इस रूट से यात्रा का समय करीब दो सप्ताह तक कम हो सकता है और समुद्री दूरी में लगभग 40 फीसदी तक की कमी आ सकती है।

उदाहरण के तौर पर चीनी कंपनी सी लेजेंड के अनुसार, चीन के निंगबो से ब्रिटेन के फेलिक्सस्टोव तक उसका जहाज नॉर्दर्न सी रूट से करीब 20 दिनों में पहुंच सकता है, जबकि स्वेज नहर के रास्ते यही यात्रा लगभग 40 दिन ले सकती है।

लाल सागर और होर्मुज संकट ने बढ़ाई वैकल्पिक रास्ते की जरूरत

इस समुद्री मार्ग में भारत की दिलचस्पी सिर्फ दूरी कम होने की वजह से नहीं बढ़ी है। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने पारंपरिक समुद्री रास्तों को ज्यादा जोखिम वाला बना दिया है।

लाल सागर में हूती हमलों के कारण कई अंतरराष्ट्रीय जहाजों को लंबे समय से वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ा है। वहीं, होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव ने भी वैश्विक शिपिंग को प्रभावित किया है।

ऐसी परिस्थितियों में जहाजों को कभी-कभी अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप के रास्ते भेजना पड़ता है, जिससे यात्रा लंबी और महंगी हो जाती है।

चीन और दक्षिण कोरिया भी बढ़ा रहे हैं गतिविधियां

भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो इस आर्कटिक समुद्री मार्ग में संभावनाएं तलाश रहा है।

चीनी शिपिंग कंपनी सी लेजेंड ने दुनिया के सबसे उत्तरी समुद्री क्षेत्र में निर्धारित साप्ताहिक कंटेनर सेवा शुरू की है। वहीं दक्षिण कोरिया का पैनस्टार समूह भी नॉर्दर्न सी रूट के जरिए बुसान से ब्रिटेन, नीदरलैंड और पोलैंड तक जहाज भेजने की योजना बना रहा है।

यानी आर्कटिक का यह रास्ता धीरे-धीरे केवल रूस की क्षेत्रीय शिपिंग योजना नहीं रह गया है, बल्कि एशिया और यूरोप के बीच एक संभावित वैकल्पिक व्यापार कॉरिडोर के रूप में उभर रहा है।

विशेषज्ञ की राय: भारत को मिल सकती है रणनीतिक बढ़त

“नॉर्दर्न सी रूट में भारत की दिलचस्पी सिर्फ लॉजिस्टिक्स तक सीमित नहीं है। इसका इस्तेमाल भारत को रणनीतिक स्वायत्तता देगा और लाल सागर से गुजरने के दौरान आने वाले सुरक्षा जोखिमों से बचने में मदद कर सकता है। साथ ही, इससे रूसी तेल, गैस और खनिजों तक पहुंच के लिए एक नया चैनल भी खुल सकता है।”

सेडोमिर नेस्टोरोविक, ESSEC बिजनेस स्कूल में भू-राजनीति के प्रोफेसर

उनके मुताबिक, भारत के लिए यह मार्ग सिर्फ समय और दूरी बचाने का विकल्प नहीं, बल्कि अपनी व्यापारिक और रणनीतिक निर्भरता को संतुलित करने का माध्यम भी बन सकता है।

सुरक्षा विशेषज्ञ इवान लिडारेव के अनुसार, नॉर्दर्न सी रूट और इससे जुड़े पूर्वोत्तर मार्ग में एशिया और यूरोप को तेजी से जोड़ने की बड़ी क्षमता है। उनके मुताबिक, इस रूट के विकसित होने से रूस के ऊर्जा संसाधनों को एशिया तक पहुंचाने में भी मदद मिल सकती है।

जलवायु परिवर्तन ने भी खोला रास्ता

नॉर्दर्न सी रूट की बढ़ती चर्चा के पीछे जलवायु परिवर्तन भी एक महत्वपूर्ण कारण है। आर्कटिक क्षेत्र में समुद्री बर्फ की स्थिति में बदलाव के कारण गर्मियों के महीनों में इस मार्ग पर जहाजों की आवाजाही की संभावना बढ़ी है।

दिए गए विवरण के मुताबिक, यह रूट आम तौर पर जुलाई से अक्टूबर के बीच शिपिंग के लिए ज्यादा अनुकूल रहता है। हालांकि, आर्कटिक में मौसम और बर्फ की स्थिति तेजी से बदल सकती है, इसलिए यहां सामान्य समुद्री मार्गों की तुलना में अलग तरह की तैयारी और सुरक्षा व्यवस्था की जरूरत होती है।

भारत को क्या फायदा हो सकता है?

भारत के लिए इस रूट का सबसे बड़ा फायदा समय और दूरी में संभावित कमी हो सकता है। इसके अलावा यूरोप तक पहुंचने के लिए एक अतिरिक्त समुद्री विकल्प मिलने से किसी एक रूट पर निर्भरता कम हो सकती है।

रूसी ऊर्जा और खनिज संसाधनों तक पहुंच के लिए भी यह मार्ग एक नया व्यापारिक चैनल उपलब्ध करा सकता है।

भारत के लिए यह पहल ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब वैश्विक व्यापार मार्ग लगातार भू-राजनीतिक तनाव, सुरक्षा जोखिम और बढ़ती शिपिंग लागत से प्रभावित हो रहे हैं।

हालांकि, नॉर्दर्न सी रूट को स्वेज नहर का सीधा विकल्प मानना अभी जल्दबाजी होगी। आर्कटिक का कठोर मौसम, सीमित समय की नेविगेशन विंडो, बर्फ की स्थिति और विशेष समुद्री ढांचे की जरूरत जैसी चुनौतियां इस रूट के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल को प्रभावित कर सकती हैं।

फिलहाल भारत का 2027 का पायलट जहाज इस बात की दिशा में पहला महत्वपूर्ण कदम होगा कि क्या आर्कटिक का यह रास्ता वास्तव में भारत-यूरोप समुद्री व्यापार के लिए एक भरोसेमंद नया कॉरिडोर बन सकता है।

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