समाचार गढ़, 9 अक्टूबर 2026|
जिन माता-पिता ने बच्चों की परवरिश के लिए अपनी पूरी जिंदगी लगा दी, उन्हें पढ़ाया-लिखाया और अपने पैरों पर खड़ा किया, उन्हीं माता-पिता की अस्थियां आज अंतिम विदाई के इंतजार में रखी हैं। उत्तर प्रदेश के कानपुर में स्थित अस्थि कलश बैंक की यह तस्वीर रिश्तों और जिम्मेदारियों को लेकर कई सवाल खड़े करती है। यहां 24 से ज्यादा अस्थि कलश रखे हैं, जिन्हें लेने के लिए परिजन अब तक नहीं पहुंचे। कुछ कलश कई महीनों से तो कुछ करीब छह साल से रखे होने की बात सामने आई है।
पितृपक्ष में जब लोग अपने पूर्वजों के लिए तर्पण करते हैं और उनकी आत्मा की शांति के लिए पूजा-पाठ करते हैं, तब इन कलशों की कहानी और भी भावुक कर देती है। इन अस्थियों का गंगा में विसर्जन किया जाना था, लेकिन परिजनों के नहीं पहुंचने से अंतिम संस्कार की यह प्रक्रिया अधूरी रह गई है।
किसी कलश में मां की अस्थियां, तो किसी में पिता की
कानपुर के भैरव घाट स्थित अस्थि कलश बैंक में रखे कलश सिर्फ मिट्टी के बर्तन नहीं, बल्कि किसी परिवार की आखिरी निशानी हैं। किसी में मां की अस्थियां हैं, तो किसी में पिता की। कुछ कलश उन लोगों के हैं, जिनके साथ उनके परिजनों ने जिंदगी का लंबा सफर बिताया था।
आमतौर पर यहां अस्थियों को करीब 30 दिन तक सुरक्षित रखने की व्यवस्था है। इस अवधि में परिजन कलश लेकर जाते हैं और धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार अस्थियों का विसर्जन करते हैं। लेकिन कुछ मामलों में तय समय बीतने के बाद भी कोई कलश लेने नहीं आता। महीने गुजरते हैं, साल बीत जाते हैं, मगर अपनों का इंतजार खत्म नहीं होता।
समय-समय पर होती है अस्थियों की पूजा
इस अस्थि कलश बैंक का संचालन युग दधीचि देहदान संस्थान की ओर से किया जाता है। सामाजिक संगठन ने यहां देखरेख के लिए एक केयरटेकर भी रखा है। यहां रखी अस्थियों की समय-समय पर पूजा कराई जाती है।
घाट पर जहां लोग अपने पूर्वजों के लिए श्रद्धा से तर्पण करते हैं, वहीं इन कलशों के साथ जुड़ी कहानियां एक अलग ही तस्वीर सामने लाती हैं। इन अस्थियों से जुड़े परिजनों के लौटने और धार्मिक परंपराओं के अनुसार अंतिम विदाई पूरी करने का इंतजार अब भी बना हुआ है।
तीन बेटे, फिर भी सात महीने से रखी हैं पिता की अस्थियां
अस्थि कलश बैंक की देखरेख करने वाले व्यक्ति ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर एक ऐसा मामला बताया, जो इस स्थिति को और गंभीर बनाता है। उनके मुताबिक, एक सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी की मार्च में मृत्यु हो गई थी। उनके तीन बेटे हैं—दो विदेश में रहते हैं, जबकि तीसरा दक्षिण भारत की एक बड़ी कंपनी में वरिष्ठ पद पर कार्यरत है।
देखरेख करने वाले के अनुसार, पिता की मृत्यु की खबर मिलने पर एक बेटा कानपुर आया था, लेकिन वह अस्थियां अपने साथ नहीं ले गया। उसने कथित तौर पर कहा था कि वह तीन-चार दिन बाद लौटकर कलश ले जाएगा। लेकिन करीब सात महीने बीतने के बाद भी वह वापस नहीं आया।
फोन पर टालते रहे, फिर कहा- पैसे भेज दूंगा
देखरेख करने वाले का कहना है कि शुरुआत में संबंधित बेटा फोन उठाता था, लेकिन बाद में वह बार-बार बाद में बात करने की बात कहकर टालने लगा। कुछ महीने पहले जब उसे बताया गया कि काफी समय बीत चुका है और उसके पिता की अस्थियों का विसर्जन कर देना चाहिए, तो उसने कथित तौर पर कहा कि वह पैसे भेज देगा और देखरेख करने वाला व्यक्ति ही यह काम कर दे।
यह पूरा घटनाक्रम देखरेख करने वाले के बयान पर आधारित है। संबंधित परिवार का पक्ष सामने नहीं आया है, इसलिए इस मामले में दूसरे पक्ष की बात भी महत्वपूर्ण होगी।
रिश्तों और जिम्मेदारियों पर सवाल
कानपुर के इस अस्थि कलश बैंक में रखे कलश एक संवेदनशील सामाजिक सवाल सामने रखते हैं—क्या अंतिम विदाई जैसी जिम्मेदारी भी समय और सुविधा के हिसाब से टाली जा सकती है? हालांकि, हर परिवार की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं और परिजनों के नहीं पहुंचने के पीछे के कारणों की जानकारी सभी मामलों में उपलब्ध नहीं है।
फिलहाल, यहां रखे 24 से ज्यादा अस्थि कलश उन लोगों के लौटने का इंतजार कर रहे हैं, जो अपने प्रियजनों की अंतिम विदाई की प्रक्रिया पूरी कर सकें।








