समाचार गढ़ 17 मार्च 2026। राजस्थान के टीएसपी (Tribal Sub Plan) क्षेत्रों में आरक्षण को लेकर सियासत गरमा गई है। पंचायत और निकाय चुनावों से पहले OBC, MBC और EWS वर्ग ने अपने लिए आरक्षण की मांग तेज कर दी है, वहीं आदिवासी संगठनों ने ST कोटा बढ़ाने की मांग उठाकर मुद्दे को और जटिल बना दिया है। इस बीच गुर्जर नेता विजय बैंसला द्वारा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को लिखे गए पत्र के बाद यह विवाद अब राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।
TSP क्षेत्र क्या है?
राजस्थान के जिन जिलों में आदिवासी आबादी ज्यादा है—जैसे
बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, सिरोही, उदयपुर, राजसमंद—उन्हें TSP क्षेत्र माना जाता है।
यह क्षेत्र संविधान की **पाँचवीं अनुसूची** के तहत विशेष संरक्षण पाता है।
अभी आरक्षण की स्थिति
TSP क्षेत्र में:
ST (अनुसूचित जनजाति): 45%
SC (अनुसूचित जाति): 5%
बाकी: 50% (अनारक्षित)
लेकिन इस 50% अनारक्षित हिस्से में OBC, MBC, EWS के लिए अलग से कोई कोटा नहीं है।
जबकि गैर-TSP क्षेत्रों में:
OBC: 21%
MBC: 5%
EWS: 10%
OBC, MBC, EWS की मांग
गुर्जर नेता विजय बैंसला ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को पत्र लिखकर कहा:
TSP में रहने वाले OBC, MBC, EWS युवाओं को आरक्षण नहीं मिल रहा
यह समानता के अधिकार (अनुच्छेद 15 और 16) के खिलाफ है
उन्हें भी सरकारी नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण मिलना चाहिए
राजनीतिक आरक्षण (पंचायत/निकाय) में भी हिस्सेदारी की मांग
आदिवासी (ST) संगठनों की मांग
दूसरी तरफ आदिवासी संगठनों की अलग मांग है:
ST को उनकी जनसंख्या के हिसाब से 70–80% आरक्षण दिया जाए
अभी 45% आरक्षण कम बताया जा रहा है
प्रशासनिक सेवाओं में:
ST के 12% कोटे में से 6.5% सिर्फ TSP क्षेत्र के आदिवासियों के लिए अलग किया जाए
तर्क: गैर-TSP ST उम्मीदवार ज्यादा फायदा उठा रहे हैं
विवाद क्यों बढ़ रहा है?
यह मामला इसलिए संवेदनशील है क्योंकि:
दोनों पक्ष (OBC/MBC/EWS और ST) अपने-अपने हक की बात कर रहे हैं
आरक्षण का कुल प्रतिशत बढ़ाना कानूनी रूप से चुनौतीपूर्ण है (50% सीमा का मुद्दा)
पंचायत और निकाय चुनाव नजदीक हैं, इसलिए राजनीति तेज हो गई है
भारतीय आदिवासी पार्टी** जैसे दल भी इस मुद्दे को जोर से उठा रहे हैं
असल टकराव क्या है?
एक तरफ:
OBC/MBC/EWS = “हमें भी आरक्षण चाहिए”
दूसरी तरफ:
ST संगठन = “हमारा आरक्षण बढ़ाया जाए और सुरक्षित किया जाए”
आगे क्या हो सकता है?
सरकार को संतुलन बनाना पड़ेगा
कानूनी और संवैधानिक पहलुओं की जांच होगी
चुनाव से पहले कोई आंशिक या राजनीतिक समाधान आ सकता है
मामला कोर्ट तक भी जा सकता है










