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आभासी दुनिया में संपर्क बढ़े पर सरोकार के भाव खत्म, दो दिवसीय कविता समारोह का हुआ समापन

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समाचार-गढ़, श्रीडूंगरगढ़. राष्ट्रभाषा हिन्दी प्रचार समिति व राजस्थान साहित्य अकादमी की ओर से आयोजित इक्कीसवीं सदी की राजस्थान की हिन्दी कविता विषय पर दो दिवसीय समारोह का समापन रविवार को हुआ। इसमें कविता और काव्य कर्म के विभिन्न पहलुओं पर विभिन्न क्षेत्रों से आए साहित्यकारों ने चिंतन मंथन किया।
समारोह के तीसरे सत्र में समय का साक्ष्य राजस्थान की कविता विषय पर हुई संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डॉ. चेतन स्वामी ने कहा कि पल प्रतिपल साहित्य की फिक्र करना जरूरी है। रचनाकार नकारात्मक समय को बदलने में सक्षम होते हैं।मुख्य अतिथि साहित्यकार नवनीत पांडे ने कहा कि कविता के मूल भावों को बरकरार रखने के लिए समर्पण आवश्यक है। कवयित्री मोनिका गौड़ ने 21वी सदी में राजस्थान की हिन्दी कविता में मुखर हो रही स्त्री विषय पर पत्रवाचन करते हुए कहा कि आज के राजस्थान की हिन्दी कवयित्रियों ने नारी विमर्श और नारी मन को लेकर सदियों से स्थापित बेवजह के मिथक तोड़कर नये प्रतिमान रचे है।साहित्यकार डॉ.मदनगोपाल लढ्ढा ने राजस्थान की हिन्दी युवा कविता के संदर्भ में पत्रवाचन करते हुए कहा कि आभासी दुनिया में संपर्क के साधन तो बढ गए हैं पर सरोकारों के भाव खत्म हो गए हैं।
समाहार सत्र की अध्यक्षता करते हुए साहित्यकार मालचंद तिवाङी ने कविता और काव्य कर्म की विराटता को अनुभव व विचार अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम बताया। मुख्य अतिथि साहित्यकार नटवरलाल व्यास ने कहा कि मानव मन के भीतर को सामने रखती कविता मनुष्यता को सुदृढ़ व परिपक्व करती है। राजेश चड्ढा ने कहा कि कविता ने समय के सच को सामने रखते हुए मनुष्य का सदैव मार्गदर्शन कर सच्ची और उन्नत राह दिखाई है। संचालन कवि शंकर सिंह राजपुरोहित ने किया। संस्था अध्यक्ष श्याम महर्षि ने आभार जताया।
इस मौके पर साहित्यकार डा.मदन सैनी व मालचंद तिवाङी ने भी विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन कवयित्री डा.संजू श्रीमाली ने किया।
इस दौरान दयाशंकर शर्मा, गोपीराम नाई, सोहनलाल ओझा, रमेश व्यास, मनीष शर्मा, विजय महर्षि, महावीर सारस्वत, महेश जोशी, बुधाराम बिश्नोई, थानमल भाटी, सोहन पुरी, नारायण सारस्वत आदि मौजूद रहे।

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