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“अट्टा-सट्टा” कुप्रथा है। हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, बेटियां सौदे की वस्तु नहीं, मंजूर किया तलाक, फैसला बनेगा नजीर।

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“अट्टा-सट्टा” कुप्रथा है।
हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, बेटियां सौदे की वस्तु नहीं, मंजूर किया तलाक, फैसला बनेगा नजीर।

समाचार गढ़ 19 मई 2026। राजस्थान हाईकोर्ट ने अट्टा सट्टा और बाल विवाह जैसी सामाजिक कुप्रथाओं पर बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए बीकानेर से जुड़े एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया हे। हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बीकानेर फैमिली कोर्ट के पुराने आदेश को पूरी तरह रद्द करते हुए पीड़ित पति पत्नी के विवाह विच्छेद को मंजूरी दे दी है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि बेटियों को पारिवारिक समझौते या लेन देन का माध्यम नहीं बनाया जा सकता है। ऐसी कुप्रथाएं भारतीय संविधान, महिला गरिमा और बाल अधिकारों के सीधे खिलाफ है। एक बेटी, किसी दूसरे बेटे की शादी की गारंटी कभी नहीं हो सकती।
बीकानेर फैमिली कोर्ट का फैसला पलटा।
समाचार गढ़। बीकानेर की पीड़ित पत्नी ने फैमिली कोर्ट बीकानेर के उस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसने उसकी तलाक की याचिका को खारिज कर दिया था। फैमिली कोर्ट ने पहले माना था कि पत्नी ने पारिवारिक विवाद के कारण स्वेच्छा से ससुराल छोड़ा था। इस पर जस्टिस अरूण मोंगा और जस्टिस सुनील बेनीवाल की खंडपीठ ने कहा कि फैमिली कोर्ट बीकानेर ने अट्टा सट्टा प्रथा से जुड़े विवाद और वैवाहिक क्रूरता के आरोपों को एकसाथ जोड़कर गलत निष्कर्ष निकाला था।
बीकानेर महिला थाने में दर्ज है आपराधिक केस।
समाचार गढ़। बीकानेर के महिला थाने में पीड़ित पत्नी ने आरोप लगाया था कि शादी के बाद से ही उसे लगातार दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था। ससुराल पक्ष की ओर से मोटासाइकिल व सोने के आभूषणों की मांग को लेकर उसके साथ मानसिक व शारीरिक क्रूरता की गई। इस संबंध में महिला थाना बीकानेर में एफआईआर भी दर्ज कराई गई थी, जिसके बाद पुलिस ने पति और ससुर के खिलाफ आईपीसी की गंभीर धाराओं में कोर्ट में चार्जशीट पेश की थी।
अत्याचार सहने का मतलब सहमति नहीं – हाईकोर्ट
समाचार गढ़। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान निचली अदालत के तर्कों को खारिज करते हुए माना कि कोई महिला लंबे समय तक ससुराल में रही है, तो इसका यह मतलब कतई नहीं निकाला जा सकता कि उसके साथ अत्याचार नहीं हुआ। भारत में कई महिलाएं सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और बच्चों के भविष्य के लिए चुपचाप प्रताड़ना सहने को मजबूर रहती है। खंडपीठ ने अट्टा सट्टा प्रथा को सीधे तौर पर मानव जीवन का आदान प्रदान बताते हुए कहा कि यह व्यवस्था लड़कियों की स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और उनकी सहमति के अधिकार को पूरी तरह समाप्त कर देती है।

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