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40 साल बाद बोफोर्स केस पर लगा विराम: सुप्रीम कोर्ट ने आखिरी याचिका ठुकराई, 1989 में चुनावी हार की बड़ी वजह बना था घोटाला

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समाचार-गढ़ 7 अगस्त, 2026।

करीब चार दशक पुराने बोफोर्स मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को आखिरी याचिका भी खारिज कर दी। इसके साथ ही इस मामले में अब आगे कानूनी कार्रवाई की गुंजाइश खत्म हो गई है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 2005 के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली अपील पर सुनवाई से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने उस समय हिंदुजा बंधुओं और बोफोर्स कंपनी को मामले में बरी कर दिया था।

क्या था बोफोर्स मामला?

यह पूरा विवाद 1986 में भारत और स्वीडन की कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुई करीब 1,437 करोड़ रुपये की तोप खरीद डील से जुड़ा था। 1987 में स्वीडिश रेडियो की एक रिपोर्ट के बाद आरोप सामने आए कि सौदा हासिल करने के लिए कथित तौर पर करीब 60 करोड़ रुपये की रिश्वत दी गई थी।

इसके बाद बोफोर्स मामला देश की राजनीति में बड़ा मुद्दा बन गया और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे।

अदालत में केस क्यों कमजोर पड़ता गया?

बोफोर्स मामले की जांच वर्षों तक चली, लेकिन अदालत में आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त ठोस सबूत पेश नहीं किए जा सके।

दिल्ली हाईकोर्ट ने 2005 में कहा था कि CBI आरोपों को विश्वसनीय सबूतों से साबित नहीं कर पाई। विदेश से मिले कुछ दस्तावेज भी पर्याप्त रूप से प्रमाणित नहीं थे। इसके अलावा कथित कमीशन की रकम और आरोपियों के बीच सीधा संबंध भी साबित नहीं हो सका।

लंबी कानूनी प्रक्रिया और जांच में हुई देरी ने भी मामले को कमजोर किया। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में CBI की अपील में करीब 4,522 दिनों की देरी का उल्लेख किया था।

CBI की आखिरी कोशिश भी नहीं हुई कामयाब

मामला पूरी तरह बंद होने से पहले CBI ने अमेरिकी कारोबारी माइकल हर्शमैन से जुड़ी जानकारी हासिल करने की कोशिश की थी। हर्शमैन ने 2017 में बोफोर्स जांच को लेकर कई दावे किए थे।

CBI ने अमेरिका और इंटरपोल के अधिकारियों से जानकारी मांगी और बाद में अदालत के जरिए लेटर रोगेटरी के माध्यम से भी मदद लेने की कोशिश की। हालांकि, जांच एजेंसी को ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे मामले को निर्णायक रूप से आगे बढ़ाया जा सके।

बोफोर्स का असर राजीव गांधी की सरकार पर

बोफोर्स विवाद का असर 1989 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ा। 1984 में कांग्रेस ने रिकॉर्ड 404 सीटें जीती थीं, लेकिन बोफोर्स समेत भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच 1989 में पार्टी को सत्ता गंवानी पड़ी।

तत्कालीन रक्षा मंत्री वीपी सिंह ने भी बोफोर्स विवाद के बीच 1987 में सरकार से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद यह मामला राजीव गांधी सरकार के खिलाफ विपक्ष के प्रमुख राजनीतिक मुद्दों में शामिल हो गया।

कारगिल युद्ध में बोफोर्स बनी थी ताकत

दिलचस्प बात यह है कि जिस बोफोर्स सौदे ने भारतीय राजनीति में इतना बड़ा विवाद खड़ा किया था, उसी Bofors FH-77B तोप ने 1999 के कारगिल युद्ध में भारतीय सेना की कार्रवाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

ऊंचाई वाले इलाकों में इसकी लंबी मारक क्षमता और सटीक फायरिंग ने पाकिस्तानी ठिकानों को निशाना बनाने में भारतीय सेना को महत्वपूर्ण मदद दी।

अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद करीब 40 साल से चला आ रहा बोफोर्स का कानूनी अध्याय समाप्त हो गया है।

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