‘सतलुज’ ने झकझोरा दर्शकों का दिल, पुलिस अत्याचार की कड़वी सच्चाई दिखाती है फिल्म
समाचार गढ़। पंजाबी स्टार दिलजीत दोसांझ की फिल्म ‘सतलुज’ इन दिनों चर्चा में है। मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन पर आधारित यह फिल्म पंजाब के उग्रवाद दौर में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों और पुलिस कार्रवाई के गंभीर आरोपों को सामने लाती है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे लापता लोगों और कथित फर्जी मुठभेड़ों से जुड़े मामलों की जांच ने कई चौंकाने वाले सवाल खड़े किए।
निर्देशक हनी त्रेहान की यह फिल्म लंबे समय तक सेंसर प्रक्रिया में अटकी रही और बाद में ZEE5 पर रिलीज हुई। थिएटर रिलीज न मिलने के बावजूद फिल्म को दर्शकों और समीक्षकों से काफी चर्चा मिली है।
फिल्म की कहानी एक बैंक कर्मचारी और मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के संघर्ष पर आधारित है, जिन्होंने पंजाब में बड़ी संख्या में “लावारिस” बताकर किए गए अंतिम संस्कारों की पड़ताल की थी। उनकी जांच ने उस दौर की पुलिस कार्रवाई और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए थे।
‘सतलुज’ की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह हिंसा और सत्ता के दुरुपयोग को सनसनीखेज तरीके से नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित और संवेदनशील कहानी के रूप में पेश करती है। यही वजह है कि फिल्म दर्शकों को भावनात्मक रूप से झकझोर देती है।
फिल्म की चर्चा के साथ एक बार फिर उन भारतीय फिल्मों का भी जिक्र हो रहा है, जिन्होंने पुलिस अत्याचार, हिरासत में हिंसा और सत्ता के दुरुपयोग जैसे संवेदनशील विषयों को पर्दे पर दिखाने का साहस किया। ‘सतलुज’ इसी श्रेणी की उन चुनिंदा फिल्मों में शामिल हो गई है, जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज के कठिन सवालों को भी सामने रखती हैं।









