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श्रीडूंगरगढ़ का त्रिदिवसीय प्रवास सुसम्पन्न, तोलियासर में शांतिदूत का पावन पदार्पण

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समाचार गढ़, श्रीडूंगरगढ़। वर्षों से अपने आराध्य के पदार्पण को प्यासे क्षेत्रों को तृप्ति प्रदान करते, जन-जन में सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति की ज्योति जलाते जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी श्रीडूंगरगढ़ में त्रिदिवसीय प्रवास सुसम्पन्न कर रविवार को श्रीडूंगरगढ़ से गतिमान हुए तो अपने आराध्य के प्रति अपने कृतज्ञभावों को लिए श्रीडूंगरगढ़वासी भी चल पड़े। अनासक्ति की साधना करने वाले आचार्यश्री सभी पर समान रूप से आशीषवृष्टि करते हुए अगले गंतव्य की ओर बढ़ चले। मार्ग में अनेकानेक श्रद्धालुओं की प्रार्थना को स्वीकार करते हुए आचार्यश्री महाश्रमणजी चिलचिलाती धूप में लगभग दस किलोमीटर का विहार कर तोलियासर में स्थित राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय में पधारे। विद्यालय परिसर में आयोजित मुख्य प्रवचन कार्यक्रम के दौरान साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभाजी ने तेरापंथ धर्मसंघ के दसमाधिशास्ता आचार्य महाप्रज्ञजी के कर्तृत्वों का गुणानुवाद किया। अपने उत्तराधिकार प्रदाता महात्मा महाप्रज्ञजी की 103वीं जन्मदिवस पर युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी ने लोगों को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि दो शब्द हैं- भोग और योग। जो प्राणी आसक्तिपूर्वक भोग करता है, वह कर्मों से चिपक जाता है और सघन रूप में पापकर्म का बंध कर लेता है। आसक्तिपूर्ण भोग पापकर्म के बंध का हेतु बन जाता है। बंधन से मुक्ति पाने के लिए आदमी को योग का सहारा लेना होता है। आदमी को भोग से योग की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। हंसी-मजाक, विनोद, टेलीविजन, नाटक आदि कई प्रकार से आदमी अपना मनोरंजन करता है, परन्तु आदमी को मनोरंजन से आत्मरमण की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। आदमी जो प्रवृत्ति करता है, उसका भी अपना महत्त्व हो सकता है, किन्तु प्रवृत्ति निवृत्ति की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए। यदा-कदा इस धरती महापुरुष जन्म लेते हैं। आज परम वंदनीय आचार्य महाप्रज्ञजी का 103वां जन्मदिवस है। दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान शताब्दी वर्ष आया था और कोविड-19 के कारण वह सारा कार्यक्रम वर्चुअल रूप में हुआ था। हालांकि उसे हमारे देश के प्रधानमंत्रीजी ने प्रशंसा की कि इस ढंग से अच्छा कार्यक्रम किया गया। परम पूज्य आचार्य तुलसी को अपने गुरु का बहुत लम्बा सान्निध्य नहीं प्राप्त हुआ, किन्तु आचार्य महाप्रज्ञजी तेरापंथ धर्मसंघ के ऐसे विलक्षण आचार्य हुए जिन्हें मुनि नथमल के रूप में, महाप्रज्ञ के रूप में, युवाचार्य महाप्रज्ञ के रूप में था आचार्य महाप्रज्ञ के रूप में भी उनके गुरु का सान्निध्य प्राप्त हुआ। उनमें गंभीरता थी। चिंतन की गंभीरता बड़प्पन का एक अंश होता है। उन्हें संस्कृत भाषा का कितना ज्ञान था। उनका व्याकरण का ज्ञान बहुत अच्छा था। वे मुनि काल से ही जिज्ञासा करते थे जो अच्छे विद्यार्थी का लक्षण होता है। ज्ञान के क्षेत्र में इतना आगे बढ़े कि कितने-कितने साहित्यों को पढ़ा ही नहीं, बल्कि कितने नवीन साहित्यों की रचना भी की। जैन शासन के आगमों का कितना कार्य हुआ। योग, ध्यान, जैन आगम के टिप्पण, संपादन सहित कितने साहित्यों की रचना की। प्रेक्षाध्यान, जीवन-विज्ञान जैसे जनोपयोगी अवदान दिए। हम अपने गुणों को गा सकते हैं, परन्तु हम गुरु के गुणों से गुरु बनने का प्रयास हो। मैं परम पूज्य गुरुदेव महाप्रज्ञजी के प्रति बारम्बार श्रद्धांजलि समर्पित करता हूं।

मंगल प्रवचन के उपरान्त अतिरिक्त जिला समन्वयक, समग्र शिक्षा बीकानेर व विद्यालय के पूर्व प्रधानाचार्य श्री गजानन सेवक ने भी अपनी हर्षाभिव्यक्ति दी और आचार्यश्री से पावन आशीर्वाद प्राप्त किया।

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