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गुरु के दरबार में होती है तृष्णा शांत- आचार्य श्री विजयराज जी म.सा.

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सच्चा है दरबार गुरु का, तू भी आकर देख ले..

समाचार गढ़। बीकानेर। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर बुधवार को बागड़ी मोहल्ला स्थित सेठ धनराज ढढ्ढा की कोटड़ी में श्री शान्त क्रान्ति जैन श्रावक संघ के 1008 आचार्य श्री विजयराज जी महाराज साहब ने  गुरु पूर्णिमा के दिन का महत्व बताते हुए चातुर्मास में इस दिन का और इस दिन से शुरू होने वाले चार माह के कार्य के बारे में विस्तार पूर्वक साधु-साध्वियों एवं श्रावक-श्राविकाओं को मार्गदर्शन दिया। महाराज साहब ने प्रश्न करते हुए कहा कि गुरु कौन है..?,  और फिर इसका उत्तर देते हुए कहा कि गुरु वह है जिसके सन्मार्ग से तृष्णाएं शांत हो  जाती है। जैन धर्म में देव, गुरु और धर्म तीन चीजें हैं। देव जो देने का कार्य करते हैं, गुरु वह है जो मार्ग दिखाता है और धर्म पहुंचाने का कार्य करता है। गुरु बने बिना  मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है लेकिन शिष्य बने बगैर मोक्ष नहीं मिलता है। इसलिए गुरु बनने का नहीं शिष्य बनने का प्रयास करना चाहिए। आचार्य श्री विजयराज जी महाराज साहब ने अपने नित्य प्रवचन में यह बात कही है। उन्होंने कहा कि शिष्य गुरु के सानिध्य में रहकर अहंकार और आवेश लोभ, काम, क्रोध और मोह का त्याग करता है, तब वह मोक्ष को प्राप्त करता है। इसलिए सब शिष्य बनें, गुरु बनने की लालसा ना करें, चिंता ना करें और ना ही कोई फिक्र करनी चाहिए। क्योंकि जो शिष्य होता है वह एक दिन गुरु बन ही जाता है।
चातुर्मास पर प्रकाश डालते हुए आचार्य श्री ने कहा कि आगम में वर्णन मिलता है कि साधु-साध्वियां 9 और 5 कल्प विहार करते हैं। इनमें जो पांचवा कल्प है वह चातुर्मास होता है। इस चातुर्मास में वर्षा के कारण जीवों की उत्पति होती है।  संसार के सभी जीवों में जिजीविषा होती है , वह  जीना चाहते हैं, मरना कोई नहीं चाहता है। एक गटर में पैदा होने वाला कीड़ा भी गटर को ही स्वर्ग मानकर जीता है। अगर उसे कहा जाए कि तुम्हें यहां से मुक्ति दिलाकर स्वर्ग में ले चलूं तो भी वह यही कहेगा कि नहीं मेरे लिए तो यही स्वर्ग है। चातुर्मास में तो ऐसे-ऐसे जीवों की उत्पति होती है, जिन्हें हम देख तक नहीं सकते। सिद्ध पुरुष हिंसा नहीं करते, ना होते देख सकते हैं। इसलिए जितने भी साधु-साध्वी हैं वह एक ही स्थान पर रहकर चार माह तक अनगार धर्म का पालन करते हैं। इसमें  पहला संकल्प है, किसी जीव को मारना नहीं, ना ही मरवाना है। अहिंसा महाव्रत का पालन करना है, महापुरुषों ने कहा भी है कि हिंसा कभी नहीं और हिंसा कहीं नहीं होनी चाहिए।
जैन धर्म में साधु-साध्वियों का वर्ष के बारह मास  में से आठ माह विहार और विचरण में व्यतीत होते हैं। शेष यह चार माह वर्षा ऋतु के होते हैं और जीव रक्षा के लिए चार माह का चातुर्मास होता है। आज आषाढ़ी पूर्णिमा है, आज से साधु-साध्वियां एक स्थान पर रहकर अपने ज्ञान और दर्शन की अभिवृद्धी का काम करेंगी। यह ठीक गाड़ी की रिपेयरिंग की तरह का काम है। वर्ष में आठ माह के विहार के बाद चार माह  एक स्थान पर रहने के बाद विहार करने से शरीर रिपेयर हो जाता है।  महाराज साहब ने कहा कि ज्ञान, दर्शन और चरित्र की अभिवृद्धी वाले इस लक्ष्य से बाधित नहीं होना चाहिए। श्रावक-श्राविकाओं से कहा कि दान,शील, तप और भाव की अभिवृद्धी करने का यह सुअवसर है। चातुर्मास आपके आत्मा को मांझने का कार्य करता है। यह चातुर्मास आपके लिए परिमार्जन करने के लिए आया है। इससे दोषों का निवारण होता है। आत्मा मैली नहीं होती है। सांसारिक व्यक्ति शरीर का रागी होता है। लेकिन साधु-साध्वियों का शरीर राग का त्यागी होता है। इन चार माह में सभी उपवास, धर्म और ध्यान में रहते हैं। चातुर्मासिक चौदस हमारा महत्वपूर्ण पर्व है। जीवन का सुर्योदय करने के लिए चातुर्मास आया है। यह भावना में रखकर काम करो, हर कार्य को प्रसन्न भाव से करना चाहिए। आचार्य श्री विजयराज जी महाराज साहब ने कहा कि यह सोचो हमें आज भाग्य से सामायिक करने का सौभाग्य मिला है, इसलिए मैं सामायिक जरूर करुंगा। इस उत्साह से कार्य करोगे तो यह उर्जा देगा।
आचार्य श्री विजयराज जी महाराज साहब के मार्गदर्शन मे व्याख्यान के बाद गुुरु महिमा को लेकर सामूहिक गीत ‘सच्चा है दरबार गुरु का तू भी आकर देख ले। मिलता है सब कुछ यहां पर , आजमा कर देख ले।। का संगान हुआ। आचार्य श्री ने भजन ‘आत्मा रे दाग लगाइजे मती, आत्मा है थारी असली सोना, सोने में खोट मिलाइजे मती’ गाकर श्रावक-श्राविकाओं को धर्म के मार्ग पर चलने और अच्छे कर्म करने की बात कही। प्रवचन से पूर्व नवदीक्षित विशाल मुनि म. सा. ने आचार्य श्री के चरणों में झुकना है, आशीष गुरु का पाना है, वंदन हो बारम्बार, एवं गुरु के चरणों में जीवन अर्पित हो, शिष्य वही है जो विनीत समर्पित हो, गुरु भक्ति गीत प्रस्तुत किया। महासती वृन्द की ओर से गुरु की महिमा बताते हुए कहा कि गुरु  ही पूर्णिमा है। पूर्णिमा का चांद जो अपनी संपूर्ण कलाओं से पूर्ण होता है, ठीक वैसे ही ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप, त्याग सब गुण गुरु में पाए जाते हैं। प्रवचन स्थल पर चार नियम की पालना करने का वचन श्रावक-श्राविकाओं से भेंट स्वरूप लिया।

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