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“UNSC में भारत की एंट्री पर किसकी नजर? पाकिस्तान-तुर्किये वाले ‘कॉफी क्लब’ की पूरी कहानी”

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समाचार-गढ़ 31 अगस्त, 2026।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में एक बार फिर भारत की एंट्री को लेकर कूटनीतिक हलचल तेज है। भारत अब तक सुरक्षा परिषद का आठ बार गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है और अगर वह दोबारा चुना जाता है तो यह उसका नौवां कार्यकाल होगा।

लेकिन भारत की राह पूरी तरह आसान नहीं है। सुरक्षा परिषद में सुधार और नए सदस्यों को शामिल करने को लेकर देशों के बीच मतभेद लंबे समय से चले आ रहे हैं। इन्हीं विरोधी आवाजों में एक प्रमुख समूह है ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ यानी UfC, जिसे आमतौर पर ‘कॉफी क्लब’ कहा जाता है।

इस समूह में पाकिस्तान और तुर्किये सक्रिय सदस्य हैं। इनके अलावा इटली, अर्जेंटीना, कनाडा, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, स्पेन और मिस्र समेत कई देश शामिल हैं।

क्या है ‘कॉफी क्लब’?

‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ का गठन जुलाई 2005 में हुआ था। इसका उद्देश्य सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध करना और व्यापक सहमति के आधार पर सुधार की मांग करना रहा है।

यह समूह खासतौर पर G-4 देशों—भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील—की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का विरोध करता रहा है।

यानी UNSC में सुधार को लेकर भारत और ‘कॉफी क्लब’ के देशों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।

UNSC में भारत का सफर कितना लंबा रहा है?

भारत पहली बार 1950-51 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गैर-स्थायी सदस्य बना था। यह वह दौर था जब कोरियाई युद्ध के कारण दुनिया शीत युद्ध के तनाव से गुजर रही थी।

उस समय भारत ने दोनों गुटों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन की कीमत पर भारत को स्थायी सीट मिलने से जुड़े कथित प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया।

इसके बाद भारत 1967-68 में फिर सुरक्षा परिषद में पहुंचा। यह दौर 1967 के अरब-इजरायल युद्ध और पाकिस्तान के साथ तनाव का था।

1972-73 में भारत का अगला कार्यकाल आया। यह बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और दक्षिण एशिया के राजनीतिक नक्शे में बड़े बदलाव के बाद का दौर था।

फिर 1977-78 में भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य बना। यह कार्यकाल देश में आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी सरकार के समय आया।

भारत इसके बाद 1984-85 और 1991-92 में भी परिषद का गैर-स्थायी सदस्य रहा।

1992 के बाद 19 साल तक क्यों रहा अंतर?

1992 के बाद भारत करीब 19 साल तक सुरक्षा परिषद से बाहर रहा।

इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं। आर्थिक सुधारों के दौर में भारत की अपेक्षाकृत कम कूटनीतिक सक्रियता, लगातार चुनावी अभियान चलाने के लिए जरूरी ढांचे की कमी और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सीटों के रोटेशन का गणित इसमें अहम रहा।

इसके बाद भारत 2011-12 में फिर सुरक्षा परिषद में लौटा।

फिर 2021-22 में भारत ने एक बार और गैर-स्थायी सदस्य के तौर पर परिषद में जगह बनाई।

2021-22 में भारत ने क्या मुद्दे उठाए?

अपने हालिया कार्यकाल के दौरान भारत ने सुरक्षा परिषद में आतंकवाद विरोधी उपायों, समुद्री सुरक्षा और शांति स्थापना में सुधार जैसे मुद्दों पर जोर दिया।

इस दौरान भारत ने अगस्त 2021 और दिसंबर 2022 में सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता भी की।

भारत लगातार यह मुद्दा उठाता रहा है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अनुरूप अधिक प्रतिनिधित्व वाला बनाया जाना चाहिए।

भारत के लिए ‘कॉफी क्लब’ क्यों अहम है?

भारत की UNSC में गैर-स्थायी सदस्यता की कोशिश और सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की उसकी नीति को अलग-अलग समझना जरूरी है।

भारत अब तक आठ बार गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है। अगर उसे दोबारा चुना जाता है, तो यह उसका नौवां कार्यकाल होगा।

वहीं दूसरी तरफ, ‘कॉफी क्लब’ जैसे समूह सुरक्षा परिषद के ढांचे में स्थायी सीटों के विस्तार का विरोध करते हैं। पाकिस्तान और तुर्किये इस समूह में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

इसलिए UNSC में भारत की भूमिका को लेकर आने वाले समय में कूटनीतिक समर्थन के साथ-साथ विरोध की राजनीति भी अहम रहने वाली है।

भारत के आठ कार्यकालों को देखें तो सात दशकों से ज्यादा के सफर में वह कुल 16 साल सुरक्षा परिषद का गैर-स्थायी सदस्य रहा है।

अब नजर इस बात पर है कि क्या भारत एक बार फिर सुरक्षा परिषद में अपनी जगह बनाने में कामयाब होगा, और क्या ‘कॉफी क्लब’ की राजनीति उसके सामने चुनौती बनी रहेगी?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यानी UNSC में एक बार फिर भारत की एंट्री को लेकर कूटनीतिक हलचल तेज है। भारत अब तक सुरक्षा परिषद का आठ बार गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है और अगर वह दोबारा चुना जाता है तो यह उसका नौवां कार्यकाल होगा।

लेकिन भारत की राह पूरी तरह आसान नहीं है। सुरक्षा परिषद में सुधार और नए सदस्यों को शामिल करने को लेकर देशों के बीच मतभेद लंबे समय से चले आ रहे हैं। इन्हीं विरोधी आवाजों में एक प्रमुख समूह है ‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ यानी UfC, जिसे आमतौर पर ‘कॉफी क्लब’ कहा जाता है।

इस समूह में पाकिस्तान और तुर्किये सक्रिय सदस्य हैं। इनके अलावा इटली, अर्जेंटीना, कनाडा, मैक्सिको, दक्षिण कोरिया, स्पेन और मिस्र समेत कई देश शामिल हैं।

क्या है ‘कॉफी क्लब’?

‘यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस’ का गठन जुलाई 2005 में हुआ था। इसका उद्देश्य सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने के प्रस्ताव का विरोध करना और व्यापक सहमति के आधार पर सुधार की मांग करना रहा है।

यह समूह खासतौर पर G-4 देशों—भारत, जर्मनी, जापान और ब्राजील—की स्थायी सदस्यता की दावेदारी का विरोध करता रहा है।

यानी UNSC में सुधार को लेकर भारत और ‘कॉफी क्लब’ के देशों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं।

UNSC में भारत का सफर कितना लंबा रहा है?

भारत पहली बार 1950-51 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गैर-स्थायी सदस्य बना था। यह वह दौर था जब कोरियाई युद्ध के कारण दुनिया शीत युद्ध के तनाव से गुजर रही थी।

उस समय भारत ने दोनों गुटों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश की। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने चीन की कीमत पर भारत को स्थायी सीट मिलने से जुड़े कथित प्रस्तावों को स्वीकार नहीं किया।

इसके बाद भारत 1967-68 में फिर सुरक्षा परिषद में पहुंचा। यह दौर 1967 के अरब-इजरायल युद्ध और पाकिस्तान के साथ तनाव का था।

1972-73 में भारत का अगला कार्यकाल आया। यह बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और दक्षिण एशिया के राजनीतिक नक्शे में बड़े बदलाव के बाद का दौर था।

फिर 1977-78 में भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य बना। यह कार्यकाल देश में आपातकाल के बाद बनी जनता पार्टी सरकार के समय आया।

भारत इसके बाद 1984-85 और 1991-92 में भी परिषद का गैर-स्थायी सदस्य रहा।

1992 के बाद 19 साल तक क्यों रहा अंतर?

1992 के बाद भारत करीब 19 साल तक सुरक्षा परिषद से बाहर रहा।

इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं। आर्थिक सुधारों के दौर में भारत की अपेक्षाकृत कम कूटनीतिक सक्रियता, लगातार चुनावी अभियान चलाने के लिए जरूरी ढांचे की कमी और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सीटों के रोटेशन का गणित इसमें अहम रहा।

इसके बाद भारत 2011-12 में फिर सुरक्षा परिषद में लौटा।

फिर 2021-22 में भारत ने एक बार और गैर-स्थायी सदस्य के तौर पर परिषद में जगह बनाई।

2021-22 में भारत ने क्या मुद्दे उठाए?

अपने हालिया कार्यकाल के दौरान भारत ने सुरक्षा परिषद में आतंकवाद विरोधी उपायों, समुद्री सुरक्षा और शांति स्थापना में सुधार जैसे मुद्दों पर जोर दिया।

इस दौरान भारत ने अगस्त 2021 और दिसंबर 2022 में सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता भी की।

भारत लगातार यह मुद्दा उठाता रहा है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं को मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों और बदलती अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के अनुरूप अधिक प्रतिनिधित्व वाला बनाया जाना चाहिए।

भारत के लिए ‘कॉफी क्लब’ क्यों अहम है?

भारत की UNSC में गैर-स्थायी सदस्यता की कोशिश और सुरक्षा परिषद में व्यापक सुधार की उसकी नीति को अलग-अलग समझना जरूरी है।

भारत अब तक आठ बार गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है। अगर उसे दोबारा चुना जाता है, तो यह उसका नौवां कार्यकाल होगा।

वहीं दूसरी तरफ, ‘कॉफी क्लब’ जैसे समूह सुरक्षा परिषद के ढांचे में स्थायी सीटों के विस्तार का विरोध करते हैं। पाकिस्तान और तुर्किये इस समूह में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।

इसलिए UNSC में भारत की भूमिका को लेकर आने वाले समय में कूटनीतिक समर्थन के साथ-साथ विरोध की राजनीति भी अहम रहने वाली है।

भारत के आठ कार्यकालों को देखें तो सात दशकों से ज्यादा के सफर में वह कुल 16 साल सुरक्षा परिषद का गैर-स्थायी सदस्य रहा है।

अब नजर इस बात पर है कि क्या भारत एक बार फिर सुरक्षा परिषद में अपनी जगह बनाने में कामयाब होगा, और क्या ‘कॉफी क्लब’ की राजनीति उसके सामने चुनौती बनी रहेगी?

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