सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी. अनंत नागेश्वरन ने पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाने यानी E20 को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी है। उनका कहना है कि पुराने टू-व्हीलर्स के लिए E10 पेट्रोल की बिक्री भी जारी रहनी चाहिए। साथ ही उन्होंने चेताया कि एथेनॉल की मांग लगातार बढ़ी तो इसका असर खाद्य फसलों, महंगाई और पानी के संसाधनों पर पड़ सकता है।
समाचार-गढ़ 17 अगस्त, 2026।
8 करोड़ पुराने वाहनों को लेकर चिंता
नागेश्वरन के मुताबिक देश में करीब 8 करोड़ पुराने बाइक और स्कूटर हैं, जो पुरानी कार्बोरेटर तकनीक पर चलते हैं। उनके अनुसार E20 पेट्रोल से इन वाहनों में इंजन ज्यादा गर्म होने और रबर पाइप व दूसरे हिस्सों के खराब होने का खतरा हो सकता है।
इसलिए उनका सुझाव है कि जब तक इन पुराने वाहनों में जरूरी बदलाव नहीं किए जाते, तब तक पेट्रोल पंपों पर E10 पेट्रोल का विकल्प भी उपलब्ध कराया जाए।
एथेनॉल से बढ़ सकती है खाद्य महंगाई
एथेनॉल की बढ़ती मांग के लिए गन्ना, मक्का और चावल जैसी फसलों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। नागेश्वरन के मुताबिक अगर एथेनॉल कंपनियां ज्यादा कीमत देकर मक्का खरीदती हैं, तो पोल्ट्री और डेयरी उद्योग के लिए चारा महंगा हो सकता है।
इसका असर आगे अंडे, चिकन और दूध की कीमतों पर पड़ सकता है।
चीनी और पानी पर भी दबाव
रिपोर्ट के मुताबिक इस सीजन में करीब 30 लाख टन चीनी, यानी कुल सालाना उत्पादन का लगभग 10%, एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल हुआ। इससे आने वाले समय में एथेनॉल के लिए गन्ने के इस्तेमाल को लेकर भी सरकार के सामने चुनौती खड़ी हो सकती है।
इसके अलावा गन्ने की खेती में भारी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। नागेश्वरन ने कहा कि एथेनॉल की वास्तविक लागत समझने के लिए गन्ने की खेती में इस्तेमाल होने वाले भूजल को भी ध्यान में रखना होगा।
सरकार का पक्ष क्या है?
वहीं, सरकार का कहना है कि E20 से विदेशी मुद्रा की बचत हो रही है और किसानों को फसल की बेहतर कीमत मिल रही है। सरकारी परीक्षणों के आधार पर सरकार ने यह भी कहा है कि E20 से वाहनों के इंजन को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचने के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले हैं।
सरकार ने E10 और E20 दोनों को अलग-अलग विकल्प के तौर पर उपलब्ध कराने की मांग को भी अतिरिक्त लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन लागत का हवाला देकर स्वीकार नहीं किया है।
असली सवाल सिर्फ पेट्रोल का नहीं
मुख्य आर्थिक सलाहकार की चिंता एथेनॉल ब्लेंडिंग को पूरी तरह बंद करने की नहीं, बल्कि 20% के बाद इसके प्रभावों को लेकर सावधानी बरतने की है।
अब बहस सिर्फ गाड़ी के माइलेज और इंजन तक सीमित नहीं है। सवाल यह भी है कि ईंधन सुरक्षा के लिए भारत अपनी कितनी कृषि भूमि, खाद्य फसल और पानी के संसाधनों का इस्तेमाल कर सकता है।









