समाचार-गढ़ 21 अगस्त, 2026।
वंदे मातरम् को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच एक बार फिर राजनीतिक टकराव तेज हो गया है। विवाद की वजह कांग्रेस का वह फैसला है, जिसमें पार्टी ने अपने कार्यक्रमों में राष्ट्रगीत के सिर्फ पहले दो अंतरों को गाने की बात कही है। गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस के इस रुख पर सवाल उठाते हुए इसे तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ा है।
अमित शाह ने कांग्रेस पर साधा निशाना
अमित शाह ने कांग्रेस के फैसले पर हमला बोलते हुए कहा कि पार्टी ने मुस्लिम लीग के दबाव में 1937 में वंदे मातरम् के कुछ हिस्सों को अलग किया था और उसी समय देश के विभाजन की नींव पड़ी। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस आज भी तुष्टीकरण की राजनीति के लिए इसी रास्ते पर चल रही है।
कांग्रेस ने 1937 के प्रस्ताव को बनाया आधार
कांग्रेस का कहना है कि वह 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति की ओर से लिए गए फैसले का ही पालन कर रही है। उस समय तय किया गया था कि राष्ट्रीय सभाओं में वंदे मातरम् के केवल पहले दो अंतरे गाए जाएं।
कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि उस बैठक में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, सरदार पटेल और रवींद्रनाथ टैगोर जैसे बड़े नेता मौजूद थे। कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल ने भाजपा पर वंदे मातरम् के नाम पर राजनीति और नफरत फैलाने का आरोप लगाया है।
आखिर 1937 में क्या हुआ था?
1937 के प्रस्ताव में कहा गया था कि वंदे मातरम् के पहले दो अंतरों में ऐसी कोई बात नहीं है, जिस पर किसी समुदाय को आपत्ति हो। वहीं, गीत के बाद के अंतरों में धार्मिक संदर्भ होने की बात कही गई थी, जिस पर कुछ मुस्लिम नेताओं ने आपत्ति जताई थी।
इसी को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस कार्यसमिति ने राष्ट्रीय कार्यक्रमों में सिर्फ पहले दो अंतरे गाने की सिफारिश की थी।
गांधी और नेहरू ने भी इस मुद्दे पर की थी चर्चा
महात्मा गांधी ने 18 नवंबर 1937 को नेहरू को लिखे पत्र में वंदे मातरम् को लेकर जारी विवाद का जिक्र किया था। वहीं, नेहरू ने सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखकर बताया था कि मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए छह में से केवल दो अंतरे गाने का फैसला किया गया।
कई मुस्लिम कांग्रेस नेताओं ने भी गाया था पूरा गीत
वंदे मातरम् को लेकर इतिहास का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि आजादी से पहले कई मुस्लिम कांग्रेस अध्यक्षों ने इसके पूरे छह अंतरे गाए थे। इनमें रहमतुल्लाह, नवाब सैयद मोहम्मद बहादुर, सैयद हसन इमाम, मौलाना अबुल कलाम आजाद और एमए अंसारी जैसे नेता शामिल थे।
इसके बाद 17 अक्टूबर 1937 को मुस्लिम लीग के लखनऊ अधिवेशन में वंदे मातरम् के खिलाफ प्रस्ताव पारित हुआ। इसके करीब 11 दिन बाद कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में सिर्फ दो अंतरे गाने का फैसला लिया गया।
अब फिर आमने-सामने भाजपा और कांग्रेस
भाजपा नेता इस पूरे घटनाक्रम को कांग्रेस की तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ रहे हैं, जबकि कांग्रेस 1937 के ऐतिहासिक प्रस्ताव का हवाला देकर अपने फैसले का बचाव कर रही है। कांग्रेस के मुस्लिम नेता भी पार्टी के पक्ष में सामने आए हैं।
यानी वंदे मातरम् को लेकर शुरू हुआ विवाद सिर्फ राष्ट्रगीत के गायन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़ा 1937 का इतिहास भी आज की राजनीति के केंद्र में आ गया है।









